Tuesday, June 15, 2010

ऐ अमृत साहिर न छक सकेया - एक प्रेम कहानी


अमृता प्रीतम और साहिर की प्रेम कहानी के कई अफ़साने आप सभी ने सुने होंगे | ये अफसाना जुदा न सही, पर तफसील और सदाक़त से भरपूर है | रिश्ते की नज़ाक़त और बे-साख्तःगी का बहुत ध्यान रखने की पूरी कोशिश करूंगा |

इस इश्क के फ़साने की इबारत-ए-आराई करने से पेश्तर, ये समझ लेना निहायती लाज़िम है के साहिर की नफ्सियाती हालत उनकी हस्ती के हर मोढ़ पे किस क़दर रंग बदल रही थी | तल्खी-ए-ज़ीस्त ने बचपन से जवानी तक साहिर का साथ नहीं छोड़ा | सही मानों में ये रंज-ओ-ग़म ही था जो साहिर का साथ निभाता चला गया और साहिर हर फिक्र को धुएं में उडाता चला गया |

साहिर बुनियादी तौर पे एक romantic शायर थे, जिसका इश्क कभी परवान न चढ़ सका | यही वजह थी की उनकी शायरी दर्द-ए-इश्क के अहसासात से भरपूर है | साहिर की शायरी में इश्क के हर रंग का अहसास शामिल है जो दिल की गहराईयों को छु जाता है | ये इश्क इब्तेदाई कमसिनी से सराबोर होकर जवानी के जुनूँ को सर-आमद करता हुआ आजिज़ की गिरफ्त तक जाता जान पढ़ता है |

शुरूआती मुफलिसी, वालिद से क़शीदः ताल्लुकात, वाल्देइन का जुदा होना, इन्तेहाई गैर-यकसानियत भरा मोआश्रह; सभी का साहिर की शायरी और इश्क से ताल्लुक है |

साहिर का पहला प्यार, उनके करीबी दोस्त फैज़-उल-हसन के मुताबिक एक लड़की प्रेम चौधरी था, जिसका इन्तेकाल बे-वक़्त TB की वजह से जवानी में ही हो गया | आज़ुर्दः साहिर ने इस वाक़िये पर एक नज़्म 'मरघट' लिखी |

ये करीबन १९३९ का साल था और अभी इस हादसे को हुए ज्यादा वक़्त नहीं गुज़रा था, इसी बीच साहिर एक और बार इश्क में गिरफ्तार हो गए | ये मोआमला पहले से ज्यादा संगीन था, और लड़की थी 'ऐशर कौर' - एक सिख, जो ख़ूबसूरत, गुल-बदन, मूअनस, लताफ़त से लबालब थी | साहिर बतौर शायर अपना सिक्का जमा चुके थे और college के हर समागम में बढ़-चढ़ के हिस्सा लेते थे | साहिर की ये वाराफ्तःगी, परस्तिश में तब्दील होते जा रही थी |

गर्मियों की छुट्टियों से पहले, जब ऐशर अपने गाँव जाने वाली थी, दोनों ने एक शाम college में तन्हाई में मिलने का इरादा किया | ये तो यकीनी तौर पे कहना मुश्किल है के, उन दोनों के दरमयान क्या हो गुज़रा (पढ़ने वाले इन्फिरादी तौर पे खुद तसव्वुर कर लें), बहरहाल, college के चौकीदार ने दोनों की शिकायत Principal से कर दी | जिसका अंजाम ये हुआ के, दोनों को college से निकाल दिया गया | साहिर के college से निकले जाने की एक और कहानी भी है, जिसके मुताबिक साहिर पर गाँव में जा कर किसानों को हुकूमत के खिलाफ भड़काने का इलज़ाम था | कुछ लोगों का मानना है कि लड़की के दौलतमंद बाप को माली तौर पे फटेहाल साहिर से बेटी की ये मोहब्बत रास नहीं आई और college से साहिर को निकालने में अपनी दौलत की ताक़त का इस्तेमाल किया | बहरहाल, college से निकाले जाने के बाद दोनों मुख्तसर से वक़्त के लिए अलैहदः हो गए और एक बार फिर ख़तों और नादिर मुलाक़ातों के ज़रिये अपनी मोहब्बत को रफ्ता-रफ्ता आगे बढ़ाने लगे |

यूँ अचानक तेरी आवाज़ कहीं से आई
जैसे पर्वत का जिग़र चीर के झरना फूटे
या ज़मीनों की मोहब्बत में तड़प कर नागाह
आसमानों से कोई शोख़ सितारा टूटे

तू मेरे पास न थी, फिर भी सहर होने तक
तेरा हर सांस मेरे जिस्म को छुकर गुज़रा
क़तरा-क़तरा तेरे दीदार की शबनम टपकी
लम्हा-लम्हा तेरी खुशबू से मुअत्तर गुज़रा

ये तकरीबन १९४३ का वाकिया है, जब साहिर लुधियाना से लाहौर अपनी क़िताब 'तल्खियां' शये कराने के इरादे से आये हुए थे | इधर लुधियाने में ऐशर कौर ने अपने वालिद की ख्वाईश के खिलाफ़ बगावत कर दी और साहिर से मिलने लाहौर चली आई | दोनों ने एक रात साथ गुज़ारी और सुबह होते ही किसी गुमनाम वजह से बम्बई चली आई | शायद इन हालात में वालिद के पास वापिस जाना उन्हें नावाजिब लगा हो | खैर, बम्बई आने के बाद उन्हें कोई पुराना करीबी मिल गया, जिस से ऐशर ने जल्द ही निकाह कर लिया |

"बिछड़ गया हर साथी दे कर, पल दो पल का साथ
किसको फुर्सत है जो थामे दीवानों का हाथ
हमको अपना साया तक, अक्सर बेजार मिला
हमने तो जब कलियाँ मांगीं, काँटों का हार मिला!"

साहिर के इश्क की ये दूसरी नाक़ामी थी | न-खुशगवार हालात, मुफलिसी, न-पज़ीराई वगेहरह ने साहिर के दिल पर गहरा ज़ख्म छोड़ा | साहिर देखने में इतने ख़ूबसूरत न रहे हों, लेकिन उनका अपने आप को बदसूरत मानना नफ्सियाती तौर पे और भी बुरा था, जो उन्हें आने वाली ज़िन्दगी में उनके मुकाबिल और मुश्किलें पैदा करने वाला था |
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अब तक साहिर बम्बई आकर फिल्मो में गीत लिखना शुरू कर चुके थे और खासा नाम भी कमा चुके थे | इन्ही दिनों की एक और शक्सियत मोहतरमा सुधा मल्होत्रा जो की मौसिकी में एक नामवर, तालीम-याफ्तः फनकार थी, से रब्तः रखता फ़साना सर-सरी तौर पे सुना रहा हूँ | साहिर की नाक़ाम इश्किया कोशिशों में से ये भी एक दिलचस्प इत्तेफाक है | सुधा की पैदाइश दिल्ली में ३० नवम्बर १९३० को हुयी | इनका बचपन लाहौर, भोपाल और फिरोजपुर में गुज़रा | आगरा university से संगीत में डिग्री करने के बाद, उस्ताद अब्दुल रहमान खान और पंडित लक्ष्मन प्रसाद जयपुर-वाले की सरपरस्ती में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम हासिल की | सुधा के संगीत के हुनर और बेखुद जिस्मानी खूबसूरती को पहले पहल उस ज़माने के कामयाब फ़िल्मी मौसीक़ार ग़ुलाम हैदर साहब ने फिरोजपुर के Red Cross के जलसे में पहचाना | AIR में बखूबी बतौर child artist काम करने के बाद ११ साल की उम्र से सुधा ने फिल्मो में गाना शुरू कर दिया |

इन्हें गाने का पहला मौक़ा बतौर पार्श्व गायक फिल्म आरज़ू में अनिल बिस्वास साहब के मातहत मिला | बहुत सी फिल्मों में कामयाब नगमे गाने के बावजूद सुधा दूसरी मशहूर हस्तियों मसलन लता, आशा वगैरह की फिरस्त में शामिल न हो सकी | फिल्मों में काम भी बाकाएदा हासिल नहीं हो रहा था, ऐसे में साहिर फ़रिश्ते की मानिंद सुधा की ज़िन्दगी में आये | साहिर ने नायारण दत्ता जो की उनके अच्छे दोस्तों में शुमार होते थे, से सुधा की सिफारिश की | फिर क्या था सुधा साहिर के एक से बड़कर एक ख़ूबसूरत नगमों को आवाज़ देती रही और साहिर अपनी शायरी के ज़रिये सुधा में एक महबूब ढूंढता रहा |

तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक है तुमको
मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है

मेरे दिल की मेरे जज़्बात की कीमत क्या है
उलझे उलझे से खयालात की कीमत क्या है
मैंने क्यों प्यार किया तुमसे, क्यों प्यार किया
इन परेशान सवालात की कीमत क्या है
तुम जो यह भी न बताओ तो ये हक है तुमको
मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है

ज़िन्दगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है
ज़ुल्फ़ रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है
भूख़ और प्यास की मारी इस दुनिया में
इश्क ही एक हकीकत नहीं कुछ और भी है
तुम अगर आँख चुराओ तो ये हक है तुमको
मैंने तुमसे ही नहीं सबसे मोहब्बत की है

तुमको दुनिया के ग़म-ओ-दर्द से फुर्सत न सही
सबसे उल्फत सही मुझसे ही मोहब्बत न सही
मैं तुम्हारी हूँ यही मेरे लिए क्या कम है
तुम मेरे हो के रहो,ये मेरी किस्मत न सही
और भी दिल को जलाओ तो ये हक है तुमको
मेरी बात...

इस मशहूर नगमे से वाबस्ता एक किस्सा भी है | जिस दिन ये नगमा record होने वाला था, अचानक दत्ता साहब बीमार हो गए और song picturisation मुल्तवी करना मुमकिन नहीं था | इस मौक़े पर सुधा नें नगमे की बंदिश खुद बनाने की पेशकश की, जिससे मुत्तास्सिर हुए बगैर साहिर भी न रह सके | ये नगमा बहुत ही मशहूर हुआ और साहिर के दिल की अनकही रुदाद बन के रह गया | अपनी खोटी किस्मत के मुताबिक साहिर एक बार फिर इश्क में नाकामयाब हो चुके थे | कुछ लोगों का मानना है के सुधा ने साहिर से नजदीकियां फिल्मों में काम हासिल करने के लिए बढाई और आखिरकार साहिर की मोहब्बत को रास्ता दिखा दिया | कहा जाता है, इसी नाकामी के चलते साहिर ने ये खुबसूरत नज़्म लिखी:

चलो इक बार फिर से,
अजनबी बन जाएं हम दोनो
चलो इक बार फिर से ...

न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की
न तुम मेरी तरफ़ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये मेरी बातों से
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्म-कश का राज़ नज़रों से
चलो इक बार फिर से ...

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराए हैं
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माझी की
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं
चलो इक बार फिर से ...

तार्रुफ़ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
चलो इक बार फिर से ...
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साहिर का सबसे मशहूर दस्तावेज़ इश्किया फ़साना अमृता प्रीतम से मुत्तालिक है | ये फ़साना दरअसल इसी मौज़ू के आस-पास रहता, मगर इन दोनों शक्सियात की नफ्सियाती हालत जाने बगैर इसे आगे बढाना जायज़ नहीं होगा | अमृता और साहिर की ज़िन्दगी से वाबस्ता सवालों का जवाब उनके माजी में ही दफन है |

अमृता एक साफ़, नेक और खुले दिल की मूरत थी | बगावत और नज़ाक़त उन्हें विरसे में मिले थे | इन्होने १०० से ज्यादा किताबें ज़िन्दगी रहते मुस्संनिफ कीं, जिनमें इनके २५ बरस के नाकामयाब ब्याह और १९४७ के तक़सीम का सदमा ज़ाहिर तौर पे देखने को मिलता है | इनका शुमार मुक्क़द्दम तरक्की-पसंद शायरों में किया जाता है |

अमृता की पैदाइश ३१ अगस्त १९१९ को गुजरावालां में हुयी | इनके वालिद साधू नन्द, साहूकारों के खानदान से थे और चार बेटों और एक बहन में से सबसे छोटे थे | वालिदः की बचपन में ही मौत हो जाने के बाद इनकी परवरिश नानी के यहाँ हुयी | नन्द अपनी बहन 'हाको' से बेहद मोहब्बत करता था | हाको निहायती खुबसूरत थी, जिसके चलते उसने अपने तकरीबन बदसूरत शौहर के घर जाने से इनकार कर दिया | अलाहिदगी इख्तेयार करने के बाद उसने बैराग ले लिया और भगवे कपड़े पहन लिए | हाको का इन्तेकाल जल्द ही हो गया और नन्द का आखिरी हिमायती और सबसे अज़ीज़ रिश्ता ज़र्रों की नज़र हो गया | नन्द अपनी तमाम दौलत और जाएदाद को छोड़ संत दयाल सिंह के डेरे में जाकर रहने लगा | इसी बीच ये नाशिनास फितरत और दिमाग-फिरोज़ बंदा मुख्तलिफ ज़ुबानों में माहिर होकर 'बालका साधू' कहलाया जाने लगा | नन्द के मामा-मामी ने कुछ बरस पहले इनका ब्याह अमृतसर में तय कर दिया था, जिस से किनारा करते हुए नन्द ने रस्मन बैराग ले लिया और खुदा की बंदगी में कलाम लिखने लगा |

मुस्तकबिल में अमृता की हस्ती कितनी इंकेलाबी और गैर-मामूली होने वाली थी, इसकी बुनियाद उनकी गुज़िश्तः ज़िन्दगी में रक्खी जा रही थी | हर किसी का आज, उसके माज़ी की परछाई होता है, जो तमाम ज़िन्दगी साथ-२ चलता है और मुख्तलिफ रंगों में नुमायाँ होता रहता है |

अमृता की माँ राज बीबी गुजरात के छोटे से गाँव 'माँगा' की रहने वाली थी और उसका ब्याह अदला-बदली में एक फौजी के साथ हुआ था, जो एक बार ड्यूटी पे गया तो कभी वापिस ही नहीं आया | राज बीबी अपनी बेवा भाभी के साथ गुजरावालां के छोटे से गाँव में स्कूल में पढाती थी | कभी-२ स्कूल से पहले दयाल सिंह जी के डेरे में माथा टेकने भी जाती थी | एक रोज़ की बात है, जब वो माथा टेकने के लिए डेरे गयी तो बहुत जोर से बारिश होने लगी | इतने सैलाब में डेरे से बहार जाना बेहद मुश्किल था, ऐसे में वक़्त गुजारने के लिहाज़ से दयाल सिंह जी नें "बालका साधू" को कविता सुनाने के लिए कहा | दयाल सिंह हमेशा आँखें बंद करके कविता सुनते थे, उस दिन जब कविता में भक्ति रस की जगह कुछ और सुनाई देने लगा तो यकलख्त आंखें खोली और देखा के नन्द की आंखें राज बीवी के चेहरे की खुबसुरती को निहार रही थी | नन्द की इस आशुफ़्तगी ने दयाल सिंह जी को राज बीबी से ज़ाती तौर पे मज़ाकरा करने के लिए मजबूर कर दिया | राज बीबी से तफ़्सीलि मालुमात हासिल करने के बाद दयाल सिंह जी नें नन्द को राज बीबी के साथ ब्याह करने की नसीहत दी और कहा के बैराग नन्द के लिए नहीं है |

तारीख़ को नन्द का बैराग और राज बीबी का बेवापन मंज़ूर नहीं था | इनकी तक़दीर के सितारों ने अभी इस जहाँ को एक बेशकीमती तोहफा देना था |
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शादी-शुदा ज़िन्दगी की बुनियाद रखते ही नन्द नें अपना नाम करतार सिंह हितकारी रख लिया | फिर ३१ अगस्त १९१९ का वो मुक़्क़दस दिन आया जब गुजरावालां में नन्ही अमृता ने जन्म लिया | अमृता का बचपन बहुत मामूली और सादगी भरा था | जब वो ११ बरस की थी तो उसकी माँ बहुत बीमार हो गई | अमृता का खुदा पे अटूट यकीन था, वो बचपन से ही बक़ाएदगी से तफ़क्कुर में खासा वक़्त लगाती थी | इसी के चलते, ये नन्ही सी बच्ची अपनी माँ की सलामती की दुआ करती रही और खुद को इस कदर यकीन दिलाये बैठी थी, मानो खुदा पर उसका कोई ज़ोर हो | खैर, अल्लाह की मर्ज़ी के आगे अमृता की ज़िद एक न चली और उसकी माँ इस जहाँ से गुज़र गयी | इस हादसे के बाद, अमृता का रब से रिश्ता टूट गया और वो अपने पिता की नाफ़रमानी करते हुए कहने लगी,

अमृता: "खुदा नहीं है, कहीं नहीं है"
पिता: "ऐसा नहीं कहते, वो नाराज़ हो जाता है"
अमृता: "तो हो जाए, में जानती हूँ, खुदा कोई नहीं है, ग़र होता तो मेरी ज़रूर सुनता"
पिता: "तू कैसे जानती है, वो दिखाई थोड़े ही देता है?"
अमृता: "पर उसे सुनाई भी नहीं देता"

बहरहाल, अमृता अब मुन्नकिर हो चुकी थी और ज़बरन आंखें बंद करके पिता की ख़ुशी के लिए ध्यान में बैठ जाती थी | ऐसे में वो एक शख्स का तसव्वुर करती, उसे अपना बहुत गहरा दोस्त फ़र्ज़ करती, क्योंकि वो इसकी ख़ूबसूरत तस्वीर बनता था, इसके लिए नगमे लिखता था और गा कर सुनाता था | बेशक इस शख्स का हकीकत से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन अमृता को एक मनचाहा साथी मिल गया था जिसके साथ वो बेफिक्री में रह कर, नामुराद ज़माने से दूर एक जहाँ बसा सकती थी | शायद ये शबाब के आने के दिन थे, अन्दर और बहार की दुनिया के बीच की कशमकश के दिन थे | ये वहम, वक़्त की सियाही से अमृता के ज़हन में एक अक्स बना चूका था, जिस की चाहत और तलाश में अमृता मुस्तकबिल में ठोकरें खाने वाली थी |
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अमृता की सरकश और इन्क़लाबी मिज़ाजी के नक़्श उनकी ज़िन्दगी से वाबस्ता कुछ किस्सों से ज़ाहिर होते हैं |

अमृता के वालिद धार्मिक, रवायती और खुले दिल के मालिक थे | उनके कुछ मुसलमान दोस्त अक्सर घर आते थे और अमृता की नानी उन्हें अलग से रखे बर्तनों में खाने पीने की चीज़ें पेश करती थीं | अमृता और नानी की एक दूसरे से ठनती थी, इत्तेफाक से एक रोज़ जब उसे नानी की इस हरक़त का पता चला तो वालिद साहब से शिकायत कर दी, जिस पर वो नानी पर बहुत नाराज़ हुए | उस दिन के बाद से घर में कोई बर्तन हिन्दू या मुस्लमान नहीं रहा | उस की ये बगावत आने वाले वक़्त में उसकी ज़िन्दगी पे क्या छाप छोड़ने वाली है, मुमकिन है इस बात से वो बेखबर थी, लेकिन मुस्तकबिल के मुभम (रहस्यपूर्ण) रिश्तों की बुनियाद रखी जा चुकी थी | साहिर, इमरोज़, सज्जाद हैदर वगैरह जो अभी अमृता की ज़िन्दगी से बहुत दूर थे, सभी मुस्लमान थे |

साल १९३६ में जब अमृता १७ बरस की थी, उसके वालिद ने माँ की मंजूरी से बुआ के बेटे से हुई बचपन (अमृता जब फ़क़त ४ बरस की थी) की सगाई को ब्याह में तब्दील करके अपना फ़र्ज़ पूरा किया | अमृता एक नए माहौल में, एक नयी हस्ती, नए वजूद में बहुत राहत महसूस नहीं कर रही थी, जबकि उसे अपने शौहर और उसके घर वालों से कोई शिकायत नहीं थी | बर खिलाफ उनका सुलूक निहायती दिलबर था और वो लोग फितरती तौर पे भी बहुत अच्छे थे | लेकिन, तकदीर की बेपरवाही के हाथों घर वालों के नसीबों पर हुए इस ज़बरन दस्तख़त से अमृता आसूदः न थी |

अमृता की ये बेबसी, मालूफ़ माहौल, अग्यार कैफियत आखिर कब तक अमृता का इम्तेहान लेते | उसका सब्र कब तलक उसके आपे में रहता, इस बात का फैसला वक़्त और तकदीर को अभी करना बाक़ी था |

अमृता की पहली किताब "ठंडियाँ किरनां" १६ बरस की नन्ही सी उम्र में लाहौर से शय हो चुकी थी, जिस में सिख गुरुओं की तारीफ और उनके मकसद बयान किये गए थे | अमृता की इस किताब को खूब तारीफ मिली और उसके मुरीदों में जगत सिंह क्वात्रा जो अनारकली बाज़ार के नामवर कारोबारी थे, जिनकी अपनी हौज़री थी, भी शामिल थे | जगत सिंह ने वक़्त गवाए बगैर अमृता का हाथ अपने बेटे प्रीत सिंह के लिए अमृता के वालिद से मांग लिया, जिससे उसकी मंगनी ४ बरस की उम्र में ही कर दी गयी थी | दोनों की शादी फ़ौरन ही कर दी गयी | ये दिन अमृता के दिलकश दिनों में से थे, इन दिनों अमृता के पास एक खुबसूरत ज़ाती बग्गी थी, जिसमें बैठ कर वो अकसर लौरेंस गार्डन घुमने जाया करती थी | इस तरह अमृता की शादी-शुदा ज़िन्दगी अहिस्ता-२ आराम और चमक दमक के बीच सरकने लगी | अमृता इस किस्म की ज़िन्दगी की आदि नहीं थी और ये सब उसे ज्यादा दिन रास भी नहीं आया और वो अपनी असल शक्सियत और आरजूओं का गला घुटते देख बेचैन होना शुरू हो गयी थी |

अमृता एक फ़ाज़िल फनकार थी और उसने घर वालों की मर्ज़ी के खिलाफ भरतनाट्यम (dance form) और सितार में तारा चौधरी से तालीम हासिल की थी | उसे लाहौर रेडियो स्टेशन से सितार बजाने और मशहूर होने का मौका भी मिला | अमृता की तस्वीर रेडियो की पत्रिका के सर-वर्क पर नशर की गयी थी | इस के बावजूद के अमृता का नए घर वालों से क़ल्बी (cordial) रिश्ता था और उसे उन से कोई खास शिकायत भी नहीं थी, अमृता की मुक्तलिफ़ फनकार-अना जुस्तजुओं को उस के घर वालों ने जिसमें शौहर और सास-सुसर शामिल थे, बेहद तर्दीदी (negative) से लिया | इन जुस्तजूओं में खसूसन अमृता का सितार बजाना, बे-खौफ समाजी मसलों पर रिसालों में लिखना, फिल्मों में अदाकारा बनने का ख्वाब देखना शामिल था | अमृता की तर्दीदी शोहरत, साबित पंजाबी मुसंनिफों का एक तरफा रव्वैया और इंकेलाबी ख्यालात ने भी घर वालों को ज़रीफी (subtly) तौर पर अमृता के खिलाफ कर दिया था | घर का माहौल बिगड़ने लगा था | अमृता के वालिद ने भी कुछ वक़्त से हजारी बाग़ में ज़मीन लेकर कुटिया बसा ली थी, जिसके चलते अमृता बहुत अकेलापन महसूस करने लगी | वक़्त के साथ अमृता का दर्द रग़ों में लहू बन के दौड़ना शुरू हो गया था | अमृता जो रफ़ाक़त और हमदर्दी अपने वालिद के १९४० में गुज़र जाने के बाद घर और शौहर में ढूढ़ रही थी वो भी न मिल सकी | अब ये हालात और अकेलापन अमृता पर बहुत भारी पड़ रहा था और वो नफ्सियाती तौर पर बीमार पड़ती जा रही थी | अमृता ने बहुत परेशानी की हालत में डॉ. लतीफ़ जो की FC कॉलेज में पढ़ाते थे और मनोविज्ञान के माहिर समझे जाते थे को बुला भेजा | डॉ. लतीफ़ भी अमृता जैसी हिम्मत वाली औरत को कबीदगी (depression) में देख हैरान रह गए और उनसे शादी-शुदा ज़िन्दगी के बारे में पूछने लगे | सवाल जवाब के दौरान अमृता ने कहा, "सिवाय इस बात के, के मुझे अपना आप इस ज़िन्दगी में जिंदा नहीं लगता, मुझे और कोई तकलीफ नहीं है" | डॉ. लतीफ़ ने अमृता से ये भी पुछा के क्या वो किसी से मुहब्बत करती है? जिस पर अमृता का जवाब था 'नहीं' और यही सच भी था | ये पूछने पर के घर छोड़ कर कहाँ जोगी, अमृता ने कहा, "प्रीत नगर चली जाऊंगी और गुरबक्श सिंह जी जो बड़े अदीब हैं के यहाँ कोई अदबी काम कर लूंगी जो मुझे भाता भी बहुत है " |

डॉ. लतीफ़ की नसीहत में अमृता को अपनापन और फिक्रमंदी नज़र आई, लेकिन वक़्त और हालात किसी के बनाये नहीं बनते और बिगाड़े नहीं बिगड़ते | मुस्तकबिल के धुंधले अक्स में अभी क्या-२ सूरतें उभरनी थी ये देखना अभी अमृता और उसकी ज़िन्दगी से वाबस्ता सभी अफराद को देखना बाकी था |

अमृता की शादी-शुदा ज़िन्दगी को तोड़ाकरीब से देखें तो मालूम होता है के उन्हें अपने शौहर से कभी कोई शिकायत नहीं थी और दोनों के बीच कोई कशीदः (strained) तआलुकात नहीं थे | शिकायत होती भी कैसे जब उनके किरदार में किसी भी सूरत में किसी से उम्मीद रखना या किसी किस्म का हक जताना शामिल ही नहीं था | इनकी लड़ाई नफ्सियाती उलझनों से थी, वो अपनी शक्सियत की गहराईयों में जाकर खुद को तलब करना चाहती थीं, वो अपने से अपना तआरुफ्फ़ करना चाहती थीं | अमृता शौहर से अलहदगी अपने रूहानी तआक्कुब (pursuits) और इन्फ्रादियत (individuality) के चलते चाहती थीं | हकीकत ये है के प्रीतम सिंह अमृता को कभी तलाक़ नहीं देना चाहते थे और बहुत मर्तबा उन्होंने अमृता की इस ख्वाइश को सीधे तौर पर न-मंज़ूर कर दिया | मियाँ-बीवी के बीच बढ़ती दूरियां आखिरकार तलाक़ तक उस वक़्त पहुंची जब प्रीतम सिंह ने एक दूसरी औरत को ज़िन्दगी में शरीक करने की सोची, जिससे वो मुहब्बत करने लगे थे | आखिरकार बरस १९६० में कानूनी तौर पर इन्होने तलाक़ ले लिया |

तलाक़ से पहले अमृता की ज़िन्दगी बहुत तावाएफ़-उल-मुलूकी (upheavel) और ज़हनी-अज़ीयत (mental agony) के दरमयान रही | इधर अमृता अपने आप से लडाई लड़ रही थी और उधर लुधियाना में अमृता से अन्जान साहिर कोम्मुनीसटों की सोहबत में रह कर समाजी लडाई लड़ रहा था | साहिर को देश के नाखुशगवार हालात ने इंकेलाबी बना दिया था | साहिर मेरठ से शय होने वाली हफ्त-रोज़ा (weekly magazine) के लिए मसल्सल बागियाना लबो-लहज़ा से लबरेज़ मंज़ोमात लिखते रहे जो की तरक्की पसंद शायरों की अंजुमन का आइना थी | जिसके चलते कॉलेज के अरबाब-ऐ-बसतो-कुशाद (senior management) ने साहिर को किसानो और मजदूरों को बरतानवी सरकार और जागीरदारों के खिलाफ भड़काने के जुर्म में कॉलेज से निकाल बहार किया | साहिर की तवज्जो इन दिनों पढ़ाई में कम और सियासी और मोआश्रति (social) मसलों में ज्यादा हो गयी थी | सियासी तौर पर साहिर का लेना देना महज़ इखलाक और मजलूमों के हक तक मेहदूद (restricted) था | इन सरगरमियों की वजह से दो मर्तबा कॉलेज में फेल भी हुए |

किसे मालूम था साहिर की इन पेश्क़दमियों की वजह से अमृता के और करीब लाहौर पहुचने वाले थे | साहिर की शायरी के इन्केबाली रंग किसी की ज़िन्दगी के इश्किया मिजाज़ को छेड़ कर सोज़-ओ-गुदाज़ की गलियों में धकेलने वाले थे |

ये ४० वें आश्रे (decade) के पहले हिस्से की बात है, जब साहिर सरकारी कॉलेज लाहौर में तालीम-शुदा थे और अमृता इस वक़्त बतौर सहाफी (Journalist)काम कर रही थी | एक रोज़ की बात है जब अमृता के बचपन से साथ-साथ चलता वो सांवला चेहरा जिस में वो अपने महबूब और खुद को कुछ मिला पाती थी, जिसकी उसे ज़माने से आरज़ू थी, जो उसे सयाना, संजीदा और मज़बूत लगता था - रिसाले में छपी एक तस्वीर की शक्ल में वजेह हो गया था | अमृता जो कुछ इस बीच लिखती रही, वो इसी हड्डियों के ढाँचे को खून और गोश्त मोहैय्या कराने के लिए लिखती थी | ये अमृता की इबादत थी जो खुदा को इंसान की शक्ल में ज़मीन पर उतारना चाहती थी | उसके मन की तहों से बाहर निकलता ये ज़र्द चेहरा उसी मज़हब का था जिस मज़हब के लोगों के लिए उसके घर के बर्तन अलग कर दिए गए थे | ये वही ख्याल था जिसे वो ज़माने से राजन के नाम से दिल में संजोये थी | ये उसी तसव्वुर की हकीकत थी जिसे ११ बरस की उम्र में इक रोज़ चोरी छुपे उसने पहला मुहब्बत भरा ख़त ४ जुमलों के शेर की शक्ल में लिखा था और वालिद की दखलंदाज़ी पर झूठ बोलने पर एक तमाचा भी खाया था | ये तमाचा अमृता की कमीज़ में मिले उस मोहब्बत भरे ख़त के लिए नहीं बल्कि झूठ बोलने के लिए था | अमृता वालिद की चाहत के मुताबिक मीरा बाई नहीं बनना चाहती थी बल्कि राजन जैसे फर्द की महबूबा बनकर रहना चाहती थी |

ये लाहौर का मज़हबी इत्तेहाद और निहायती आपसदारी का वक़्त था, जहाँ हिंदुस्तान के मुक्तलिफ़ फिरके हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख वगैहरा एक ही तहजीब के धागे में फूलों की मानिंद गुथे हुए थे | लाहौर उर्दू और पंजाबी अदब का मरकज़ (centre) था और ज़्यादातर अदब से मुताल्लिक लोग यहीं बस गए थे | अमृता प्रीतम भी इन दिनों अदबी हलको में खासी मशहूर थी और पंजाबी अदबी सरगर्मियों के दरमियान रहती थी, खसूसन गुरबक्श सिंह के पंजाबी रिसाला 'प्रीत लड़ी' से वासिल (connected) अदीबों के आस पास | इन दिनों मौसिकी और नाच की मुक्क़मिल तालीम के पेश्तर अमृता बतौर सहाफी और लोक-गीत फनकार लाहौर रेडियो में काम कर रही थी |

ये १९४४ का बरस था जब साहिर उस वक़्त के उर्दू के मअरूफ़ और निहायत मयारी ज़रीदा "अदब-ऐ-लतीफ़" के इदारा से मुदीर-ऐ-अली (chief editor) की हैसियत से वाबस्ता हो गए | इस तरह साहिर मशहूर और नामवर अदीबों और शायरों के दरमयान खुद एक शायर की हैसियत से रोज़-ब-रोज़ शौहरत हासिल करने लगे | इसी बरस साहिर का शायरी मज्मूआ "तल्खियां" भी शय हुआ था जिसकी अदबी हलकों में गैर-मामूली पजीरायी (acceptance) हुई थी | साहिर सफ़-ऐ-अव्वल के मुमताज़ शायरों में गिने जाने लगे | इन्ही दिनों की बात है जब अमृता साहिर के कलाम पढने लगी और उसे साहिर के इंकेलाबी, बे-लगाम और इश्किया ख्यालात से वाबस्तगी हो गयी | ये वाबस्तगी अहिस्ता-२ उसे साहिर के इश्क में मुब्तिला करने वाली थी | ये तकरीबन १९४४ का वाकया है जब अमृता साहिर से पहली मर्तबा प्रीत नगर के एक अदबी जलसे में रूबरू हुईं | अमृता दिल ही दिल में साहिर को पहले से ही चाहने लगी थी और इस तरह यक-ब-यक रूबरू होकर ये चाहत एक नए आयाम को हासिल हो गयी |

बेशक ये चाहत एक अरसे बाद मुश्तरक (common) और मायावी इश्क से परे साक़िब (sublime) और हकीकी रंग के दरिया में डूबने वाली थी, लेकिन इब्तेदायीन ये आब-ओ-रंग (attraction) साहिर की साहिरी से मुतास्सिर होकर इन्फरादी ख्वाईश से ज़्यादा कुछ भी नहीं था | अमृता की दीवानगी का सफ़र साहिर की बेपरवाहियों का शिकार होता हुआ मजाज़ी इश्क से हकीकी आशिक़ी की नज़र होने वाला था |
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ये शायद १९४४ की बात है जब 'आज कल' नाम के रिसाले में पहले सफे पर ताजमहल की तस्वीर के साथ एक नज़्म "मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे" छपी थी | ये नज़्म आम-ओ-ख़ास के दिल की गहराईओं में उतर गयी | इस से पहले ताजमहल को इस नुक्ता-ए-नज़र से किसी ने नहीं देखा था | ये नज़्म दीमाग और सुखन की स्याही से लबरेज़ कलम से नहीं बल्कि दिल, जज़्बात और अशफाक की स्याही में डूबी नाज़ुक कलम से लिखी गयी थी | ये साहिर लुधियानवी की नज़्म थी |

ताज तेरे लिए एक मज़हर-ए-उल्फत ही सही
तुझको इस वादी-ए-रंगीन से अकीदत ही सही

मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे
बज़्म-ए-शाही में गरीबों का गुज़र क्या मानी ?

सब्त जिस राह पे हो सतावत-ए-शाही के निशां
उस पे उल्फत भरी रूहों का सफ़र क्या मानी ?

मेरे महबूब पास-ए-पर्दा-ए-तश्हीर-ए-वफ़ा
तूने सतावत के निशानों को तो देखा होता

मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक मकानों को तो देखा होता

अन-गिनत लोगों ने दुनिया में मोहब्बत की है
कौन कहता है के सादिक न थे जज़्बे उनके

लेकिन उनके लिए तश्हीर का सामान नहीं
क्योंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफलिस थे

ये ईमारत-ओ-मक़ाबिर यह फ़सीलें ये हिसार
मुतल-कुल-हुक्म शाहेंशाहों की अजमत के सुतून

दामन-ए-देहर पे उस रंग की गुलकारी है
जिसमे शामिल है तेरे और मेरे अजदाद का खून

मेरे महबूब ! उन्हें भी तो मोहब्बत होगी
जिनकी सन्नाई ने बक्शी है इसे शक्ल-ए-जमील

उनके प्यारों के मक़ाबिर रहे-बे-नाम-ओ-नमूद
आज तक उन पे जलाई न किसी ने कंदील

ये चमनज़ार, ये जमना का किनारा, ये महल
ये मुन्क्काश दर-ओ-दीवार, ये मेहराब, ये ताक

एक शहेंशाह ने दौलत का सहारा लेकर
हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक

मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे

ये वो दौर था जब फैज़, रशीद, मजाज़, जज़्बी, जाँ-निसार अख्तर जैसे शौराओं का बहुत नाम था | हर इस्तेलाही (तकनीकी) मज़मून में इन नामों का बार-२ ज़िक्र होता था | इस फैरिस्त में अपना नाम जोड़ना वो भी ललकार के साथ, कोई आसान काम नहीं था | लेकिन साहिर लुधियानवी ने ये कारनामा बिना किसी जायद कोशिश के अंजाम दिया |

अक्तूबर १९४५ में हैदराबाद में जब ऑल-इंडिया तरक्की पसंद मुसन्नाफीं (writers) की कोन्फेरेंस हुई तो साहिर ने भी इस में शिरक़त की | ये वो इकलौता शक्स था जो पंजाब से आया था | बहुत से नामवर शायर साहिर से इस कौन्फेरेंस के दौरान पहली मर्तबा मिल रहे थे | साहिर का पहले पहल जो इन शायरों पर असर रहा, उस में से कृशन अदीब और कैफ़ी आज़मी के ख्यालात कुछ इस तरह थे | कृशन अदीब (जिनका शुमार साहिर के करीबी दोस्तों में होता है) की ज़बान में उस रोज़ साहिर को बयान करें तो, "दुबला, पतला, लम्बा नौजवान, आँखों में तलाश, चेहरे पर तल्खी और उदासी की परछाई, कोट पैंट में सजा हुआ, ढीली सी टाई पहने जो शख्स सब से अलग नज़र आ रहा था, वो साहिर था" | कैफ़ी की ज़बान में, "साढ़े पांच फुट का क़द, जो अगर सीधा किया जाये तो करीबन छः फुट हो जाये | लम्बी-२ लचकीली टांगें, पतली सी कमर, चौड़ा सीना, चेहरे पर चेचक के दाग़, तरकश नाक, खुबसूरत आंखें, आँखों में झेम्पा-२ सा फिक्र, बड़े-२ बाल, लज-लाजी चाल, जिस्म पर कमीज़, पतलून सटी हुई और हाथों में सिगरेट का डब्बा |

साहिर इन दिनों 'अदब-ए-लतीफ़' के मुदीर थे | इस कोन्फेरेंस में साहिर ने तरक्की पसंद शायरी पर मज़मून पढ़ा, जिसे बेहद दाद मिली | यूं तो साहिर का नाम बेशतर की जुबां पर था और सभी उनकी शायरी से भी वाकिफ थे, लेकिन शक्सी तौर पर साहिर की मुलाकातें बहुत कम असहाब से थीं | मज़मून पढ़ने के बाद गोया एक और दुनिया साहिर से जाती तौर पर मूतआरुफ़ हो गयी |

हैदराबाद की कौन्फेरेंस के बाद साहिर को दोस्तों एक नयी टोली मिल गयी थी | इन दोस्तों में एक नाम सज्जाद ज़हीर का भी है | सज्जाद कौन्फेरेंस में पढ़े साहिर के मक़ाले (essay) से इतने मुत्तासिर थे के साहिर को ज़ोर से गले लगा लिया और इसके बाद ये टोली जिसमें सज्जाद, कृशन अदीब, सरदार जाफरी और मजाज़ वगैरह शामिल थे साहिर को हमराह बम्बई ले गयी |

इन ही दिनों की बात है, अमृता की सज्जाद ज़हीर से दोस्ती भी खूब चर्चा में रहने लगी थी | अमृता सज्जाद को बेहद पसंद करती थी लेकिन दुनिया इस दोस्ती को कुछ और ही नाम देने पर आमादा थी | दोनों अक्सर मिला करते थे, लेकिन अमृता की ज़बान में कहें तो, "मेरी अपने समकालीनों (contemporaries) में किसी से ऐसी कोई मुलाक़ात नहीं थी जो उलझनों और गलत-फहमियों की शिकार न हुई हो, सिवा सज्जाद ज़हीर के, जिसके साथ दोस्ती लफ्ज़ आँखों के आगे झिलमिला जाता था | किसी मुलाक़ात के होंठों पर कोई शोख़ हर्फ़ कभी नहीं आया |"

लाहौर का ही एक वाकिया है, सज्जाद के एक दोस्त की बीवी ने मिठाईयां देते हुए सज्जाद को बार-२ इमरिती (An Indian sweet - sounds like Amrita) पेश की | सज्जाद ने एक दो बार हंसकर टाल दिया, लेकिन फिर संजीदा होकर बोले, "भाभी, तुमने उसके नाम को लेकर आज मुझसे मज़ाक किया है, फिर कभी न करना | तुम्हें नहीं मालूम की मेरी मुहब्बत में उसके लिए परस्तिश भी शामिल है |"

जहाँ अमृता सज्जाद में करीबी दोस्त देखती थी वहीँ साहिर में महबूब ढूँढती थी | दूसरी तरफ साहिर अमृता की आँखों में अपने लिए प्यार तो देख पाता लेकिन उसे कबूल करने की हिम्मत न रखता | इन दिनों साहिर की माली हालत भी इतनी अच्छी नहीं थी और जिम्मेदारियों का बोझ किसी भी शक्ल में उठाने के लिए वो तैयार नहीं था | साहिर आशुफ़्तगी (confusion) और पस-ओ-पेश (indecision) का शिकार था | मजलूमों और मजदूरों के हक की आवाज़ के लिए मजबूती से लड़ने मरने वाला शख्स, इन्फरादी फैसले लेने में बे-असर हो जाता था |

१९४६ के दिनों की बात है, साहिर का अमृता के घर आना जाना था | वो अमृता की बेटी कांदला से बेहद प्यार करता था और कांदला भी साहिर को बहुत चाहती थी | एक दिन साहिर कांदला को गोद में ले कर उसे एक कहानी सुनाने लगा, "एक लक्कड़हारा था, वो हर रोज़ लकड़ियाँ काटता था | एक रोज़ उसने जंगल में एक राजकुमारी को देखा, वो बेहद खुबसूरत थी | उसका मन हुआ के वो राजकुमारी को घोड़े पर बिठा कर सात समंदर पार कहीं ख्वाबों के जहाँ में ले जाये, जहाँ उन दोनों के सिवा कोई न हो | " कांदला बड़े गौर से कहानी सुन रही थी और बीच-२ में मुस्कुरा भी देती थी | साहिर कहानी सुनाता जा रहा था, "लेकिन वो तो एक लक्कड़हारा था, एक राजकुमारी को हासिल करने की कैसे सोच सकता था ? नतीजतन उसे दूर से देखता रहा और उदास होकर लकड़ियाँ फिर काटने लगा | सच्ची कहानी है न ? ", साहिर ने कांदला से पुछा | "हाँ मैंने भी देखा था", कांदला ने जाने कियों ये जवाब दिया | साहिर मुस्कुराते हुए अमृता की तरफ देखते हुए बोला, "देख लो ये भी जानती है," और बच्ची से पूछने लगा, "तुम वहीँ थी न जंगलों में?" | बच्ची ने हामी भरते हुए सर हिला दिया | साहिर ने फिर उस से पुछा, "तुमने उस लक्कड़हारे को भी देखा था न? वो कौन था ?" | जाने बच्ची को क्या सुझा, शायद किसी ने ठीक ही कहा है, बच्चों में रब बसता है, बच्ची ने जवाब दिया, "आप" | साहिर ने फिर पुछा, "वो राजकुमारी कौन थी, "मम्मा !" बच्ची ने हँसते हुए जवाब दिया | साहिर अमृता से कहने लगा, "देखा, बच्चे सब-कुछ जानते हैं |"
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साहिर और अमृता की एक दूसरे के लिए चाहत उन्ही के सीनों में दफ्न थी या यूं कह लें के वो (ख़ासकर साहिर) ज़ाहिर तौर पर इस मुहब्बत को कबूल नहीं कर पा रहे थे | जिस्मानी और ज़हीनी खूबसूरती का मेल किसी भी औरत को बेहद दिलकश बना देता है और अमृता इस मुरक्कब की जीती जागती तस्वीर थी | अमृता के इस शीरीं-बयान हुस्न के उस ज़माने में बहुत से आशना थे | ये ऐसा ही एक दौर था जब लाहौर की आबो-ओ-हवा में अमृता के इश्क की अफ़वाहें बे-लगाम आग की तरह हर-सू फ़ैल रही थीं और अमृता इस तर्दीद चर्चे (negative publicity) से आज़ुर्दः (sorrowful) थीं | ऐसा ही एक चर्चा मशहूर पंजाबी शायर मोहन सिंह को ले कर भी था, जिनके बारे में कहा जाता है की उन्होंने अमृता पर बहुत सी नज्में लिखीं हैं | मोहन सिंह फितरती तौर पर बहुत संजीदा और पुर-सुकूँ किस्म के शक्स थे, इन सब अफवाहों पर यकीन करना अमृता के लिया आसान नहीं था और न ही अमृता को उनसे कभी कोई शिकायत रही | बेशक अमृता इन सब अफवाहों से परेशान थी लेकिन मोहन सिंह की खुश-इख्लाकी के सामने वो कोई शिकवा भी नहीं कर सकती थी, बल्कि उनकी उम्र और हुनर का लिहाज़ करती थी | लेकिन आबरू को कायम रखती ये ख़ामोशी दोनों को एक गलत-फहमी का शिकार बनाने पर अमादा थी |

एक रोज़ मोहन सिंह फारसी के अदीब कपूर साहब के साथ अमृता के घर आये | तरद्दूद (hesitancy), गुस्ताखी और लिहाज़ को ओढ़े अमृता की चुप्पी को कपूर साहब ने तोडा और कहने लगे, "मोहन सिंह, अमृता को गलत मत समझना, वो तुमसे मुहब्बत नहीं करती है..." | अज़ल (eternity) से छायी इस ख़ामोशी को पिघलता देख अमृता ने कुछ कहने का हौसला किया, "मैं आपकी दोस्त हूँ,खैर-अंदेश हूँ, आप और क्या चाहते हैं ?" मोहन सिंह ने कोई जवाब नहीं दिया और बहुत दिन बाद एक छोटी सी नज़्म में ये लफ्ज़ दोहराए - "में आपकी दोस्त हूँ, ......" और जवाब के तौर पर आगे लिखा "मैंने और क्या चाहना है?"

इन्ही दिनों का एक और किस्सा है, जब अमृता लाहौर रेडियो में काम करती थी वहां के एक अफसर जो थोडा बहुत हिन्दुस्तानी अदब में दिलचस्पी रखते थे ने broadcast के दौरान एक दिन अचानक कहा, "अगर मैंने आज से कुछ बरस पहले आप को देखा होता, तो या तो मैं मुसलमान से सिख हो गया होता या आप सिख से मुसलमान हो गयी होतीं |"

अमृता के ऐसे बहुत से किस्से हैं, खासकर रेडियो लाहौर के दिनों के | लाहौर रेडियो के एक स्टाफ आर्टिस्ट जनाब सत्य देव शर्मा ने अमृता के इन्ही किस्सों से मुतास्सिर हो कर एक कहानी "26 men and a girl" लिखी, जिसे अमृता ने खुद बहुत पसनद किया क्योंकि कहानी नतीजा नहीं चर्चा बयान करती थी और कहानी को बेहद इमानदारी और सादगी से लिखा गया था |
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ये १९४६ के आखिरी दिनों की बात है, जब अमृता ने अपनी कोक में एक जादू (बच्चे) को शरीर के मांस की ओट में पनपते महसूस किया | कहा जाता है के जब औरत पेट से होती है, उन दिनों जो वो तसव्वुर करती है या देखती है वो बच्चे की शक्ल में नुमायाँ हो जाता है | अमृता भी खुद को इस वहम पर यकीन दिलाते हुए साहिर का तसव्वुर करने लगी | ये इश्क की वो इन्तहा है जिसका सबूत तारीख़ में कमतर ही देखने को मिलेगा | अमृता की ज़िन्दगी रहते जो चाहत नाकामयाबी की नज़र होती जा रही थी उसे वो इस नन्हे से बच्चे की शक्ल में पाने की ख्वाइश रखने लगी | आखिरकार ३ जुलाई १९४७ को बच्चे का जन्म हुआ और पहली बार उसे देखते ही अमृता को अपने अन्दर मौजूद रब के उस हिस्से का यकीन हो गया जो दुनिया तख्लीक़ (create) करने का इख्तेयार रखता है | बच्चे की शक्ल काफी-कुछ साहिर से मिलती-जुलती थी | इसी बात का ज़िक्र एक रोज़ जब अमृता ने साहिर से किया तो वो हँसते हुए कहने लगा, "very poor taste " | इस जवाब में साहिर का वो complex ज़ाहिर होता है के वो ख़ूबसूरत नहीं है | अमृता और साहिर के दरम्यान हुई बहुत सी बातों में साहिर का ये complex जुहूर (manifest) हो जाता है |
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एक रोज़ सुस्त दोपहर मैं साहिर 'अदब-ऐ-लतीफ़' के दफ्तर में बेहिस बैठे (जहाँ वो मुदीर की हैसियत से काम कर रहे थे ); अपनी ज़रुरत से लम्बी टांगों को बगल की खिड़की से नीले आसमान को आइना दिखाते हुए, अपनी पहली मुहब्बत को याद फरमा रहे थे | सिगरेट के धुऐं से बने भंवर उनकी अपनी ज़िन्दगी की उलझनों से कम नहीं थे जिनमें वो न-चाहते हुए उलझते और डूबते जा रहे थे | अमृता के लिए दिल में उभरती मुहब्बत उन्हें माज़ी के उन रंगीन पलों की याद दिला रही थी जब वो महिंदर चौधरी की मुहब्बत में मुब्तिला थे | बीते ज़माने की रंगीनियों का लुत्फ़ वो उन पलों को याद कर के ले रहे थे | उनकी इन यादों का सफ़र हमारे आज के ज़माने के बेहतरीन शायर 'गुलज़ार' साहब की नज़्म 'दिल ढूंढता है फिर वही' से होता हुआ उनकी अपनी शाहकार नज़्म 'पर्छाइयाँ' के इफ्तेताही आशार तक जाता हुआ जान पड़ता है |

दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन
बैठे रहे तसव्वुर-ए-जानाँ किये हुए
दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन...
जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेट कर
आँखों पे खींचकर तेरे आँचल के साए को
औंधे पड़े रहे कभी करवट लिये हुए
दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन...
या गरमियों की रात जो पुरवाईयाँ चलें
ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागें देर तक
तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुए
दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन...
बर्फ़ीली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर
वादी में गूँजती हुई खामोशियाँ सुनें
आँखों में भीगे भीगे से लम्हे लिये हुए
दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन...
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जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल
मचल रहा है किसी ख्वाब-ए-मरमरीं की तरह
हसीं फूल, हसीं पत्तियां, हसीं शाखें
लचक रही हैं किसी जिस्म-ए-नाजनीन की तरह
फ़ज़ा में घुल से गए हैं उफक के नर्म खुतूत
ज़मीन हसीं है ख्वाबों की सरज़मीन की तरह

तसव्वुरात की पर्छाइयाँ उभरती हैं

कभी गुमान की सूरत कभी यकीन की तरह
वो पेड़ जिन के तले हम पनाह लेते थे
खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह

इन्हीं के साए में फिर आज दो धड़कते दिल
खामोश होंठों से कुछ कहने सुनने आये हैं
न जाने कितनी कशाकश से, कितनी काविश से
ये सोते जागते लम्हे चुरा के लाये हैं

यही फ़ज़ा थी, यही रुत, यही ज़माना था
यहीं से हम ने मोहब्बत की इब्तिदा की थी
धड़कते दिल से, लरज़ती हुई निगाहों से
हुज़ूर-ए-ग़ैब में नन्ही सी इल्तेजा की थी

के आरजू के कँवल खिल के फूल हो जायें
दिल-ओ-नज़र की दूआयें कबूल हो जायें

तसव्वुरात की पर्छाइयाँ उभरती हैं

तुम आ रही हो ज़माने की आंख से बच कर
नज़र चुराए हुए और बदन चुराए हुए
खुद अपने क़दमों की आहात से झेंपती, डरती
खुद अपने साए की जुंबिश से खौफ खाए हुए

तसव्वुरात की पर्छाइयाँ उभरती हैं

रवां है छोटी सी कश्ती हवाओं के रुख पर
नदी के साए पे मल्लाह गीत गाता है
तुम्हारा जिस्म हर इक लहर के झकोले से
मेरी खुली हुई बाहों में झूल जाता है

तसव्वुरात की पर्छाइयाँ उभरती हैं

मैं फूल टांक रहा हूँ तुम्हारे जुड़े में
तुम्हारी आँख मुसर्रत से झुकती जाती है

तसव्वुरात की पर्छाइयाँ उभरती हैं

मेरे गले में तुम्हारी गुदाज़ बाहें हैं
तुम्हारे होंठों पे मेरे लबों के साये हैं
मुझे यकीन है के हम अब कभी न बिछड़ेंगे
तुम्हें गुमान के हम मिल के भी पराये हैं

तसव्वुरात की पर्छाइयाँ उभरती हैं

मेरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को
अदा-ए-अज्जों-करम से उठा रही हो तुम
सुहागरात जो ढोलक पे गए जाते हैं
दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम
तसव्वुरात की पर्छाइयाँ उभरती हैं

वो लम्हे कितने दिलकश थे, वो घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं
वो सेहरे कितने नाज़ुक थे, वो लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं
बस्ती की हर इक शादाब गली, खुवाबों का जज़ीरा थी गोया
हर मौज-ए-नफस हज मौज-ए-सबा, नग़मों का ज़खीरा थी गोया

ये उन दिनों की बात है जब साहिर लुधियाने के सरकारी कॉलेज में पढ़ते थे | यहीं के एक अव्वल दर्ज़े के वक़ील राम राज जो की कौंग्रेस के लीडर भी थे की बेटी महिंदर चौधरी साहिर के साथ कॉलेज में उन्ही की जमात में तालिब-ऐ-इल्म थी | घर में इंकेलाबी माहौल होने की वजह से वो भी बरतानवी (british) हुकूमत से नफरत करती थी, लेकिन खुल के इस जज़्बे का इज़हार करने की हिम्मत नहीं रखती थी | इसी नज़रिए और अहसास की वजह से वो साहिर के करीब आने लगी | साहिर की शायरी और शख्सियत से वो पहले से ही ख़ासी मुतास्सिर थी | साहिर की शायरी की बीनाई (vision) और फलसफे की वो काईल थी |

महिंदर चौधरी कोई लम्बे क़द वाली ख़ूबसूरत लड़की नहीं थी, लेकिन उसकी आँखों में कुछ अजब सी कशिश थी जो और किसी लड़की में नज़र नहीं आती थी | उसकी आँखें बोलती थी और महसूस होता था मानो ज़िन्दगी की तहों में झाँक पाती हों | उसकी आँखों की कमल के फूल के साथ तशबीह (simile) देना वाकई बद्जौकी होता | उस की आँखें तो कमल से मज़ीद (more) रोशन, झील के पानी से ज्यादा गहरी थीं | उसकी ख़ूबसूरत आंखें एक साहिरी नगमें के मानिंद थीं, और आवाज़ जैसे मुहब्बत का पैग़ाम, ज़िन्दगी के हुस्न की दिलकशी का शाहकार |

साहिर की शायरी शऊर की सरहदों को छु चुकी थी | जब दीमाग राह दिखाता है तो सोच को रोशनी मिलती है | उन्ही दिनों कॉलेज युनियन के जलसे में साहिर ने इंकेलाबी नज्में पढीं और कॉलेज के तालिब-ऐ-इल्मों का प्यारा हो गया | उसे ये महसूस होने लगा था, जैसे वो घुटन जो उसने कई बरसों से महसूस की थी, अब घटती जा रही थी | उसके इस हुनर की तारीफ ने उसकी बहुत हौसला अफज़ाई की |

एक शायर की हैसियत से साहिर के शुरूआती दिनों के दोस्तों में बावरी, हरक्रिशन लाल, अजैब चित्रकार, मदनलाल दीदी, मोहन सहज़ल,हामिद अख्तर, गुलाम मुर्तजा और फैज़-उल-हसन का नाम शुमार होता है | ये सभी हजरात अक्सर शाम को मिलते और लम्बी चहल कदमी करते हुए रेलवे स्टेशन के पास चाय पीने के लिए रुकते और शायरी और अदब की गुफ्तगू करते | साहिर को उन दिनों जेब खर्च के लिए १ रूपया मिला करता था, जो कम ज़रूर था लेकिन उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काफी था | एक रोज़ का वाकिया है, ये लोग हमेशा की तरह स्टेशन के पास चाय की चुस्की ले रहे थे के उन्होंने रेलवे के एक ठेकेदार को अपने मुलाजिम को बेरहमी से पीटते देखा | इन ओगों से ये सब देखा न गया और उस ठेकेदार को ज़बरन पुलिस स्टेशन ले गए | जब पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज करने को कहा तो थाने के अफसर ने इन लोगों को ही जेल में डाल दिया, कियोंकि वो ठेकेदार ताक़तवर और बड़े रसूक वाला आदमी था | इन लोगों ने एक पूरी रात बगैर किसी जुर्म के "कानून को अपने हाथ में लेने के नाम पर" इस स्टेशन में काटी |

खैर रात गई बात गई | यहाँ महिंदर चौधरी दिल ही दिल में साहिर की बहुत इज्ज़त करने लगी थी | उसे ऐसा महसूस होता था मानो उसके जज़्बात और अहसासात को साहिर ने ज़बान दे दी हो | उसकी खामोश दाद ने बोलचाल की सूरत इख्तेयार कर ली थी और दोनों अक्सर गुफ्तगू में मशगूल पाए जाने लगे | साहिर उसकी झील सी आँखों में जज़्ब हो जाना चाहता था, क्योंकि जो बात वो खुल के सामने नहीं कह सकता था, उसे लगता था के शायद वो इस तरह बता सके | महिंदर के लिए साहिर की चाहत रोज़-ब-रोज़ बदने लगी |

एक रोज़ साहिर ने अपने जिगरी दोस्त हाफिज़ लुधियानवी से साथ चलने के लिए कहा | ये गर्मियों के दिन थे, ये लोग कचहरी के करीब रेलवे के पुल के पास पहुँच गए | महिंदर का घर यहाँ से काफी नज़दीक था | साहिर पुल पर ठहर कर ही महिंदर के घर की जानिब देखता रहा | अल्लाह जाने महिंदर तक साहिर के दिल की रुदाद किस तरह पहुँच गयी और वो किसी काम से घर के छत पर आ गयी और थोड़ी देर में वापिस भी चली गयी | ये झलक दो जवान दिलों के लिए ज़िन्दगी की लहर की मानिंद थी |

तुम्हारी मस्त नज़र गर इधर नहीं होती
नशे में चूर फ़िज़ा इस कदर नहीं होती

तुम्हीं को देखने की दिल में आरज़ूएँ हैं
तुम्हारे आगे ही और ऊँची नज़र नही होती

ख़फ़ा न होना अगर बढ़ के थाम लूँ दामन
ये दिलफ़रेब ख़ता जान कर नहीं होती

तुम्हारे आने तलक हम को होश रहता है
फिर उसके बाद हमें कुछ ख़बर नहीं होती

साहिर बहुत देर तक हाफिज़ के साथ-२ चुप्पी को थामे चलते रहे और फिर आखिरकार कहने लगे, " यार हाफिज़ एक कतः है !", हाफिज़ ने इरशाद कहा और साहिर सुनाने लगा:

सामने इक मकान की छत पर
मुन्तजिर किसी की एक लड़की है
मुझको उस से नहीं तआल्लुक कुछ
फिर भी सीने में आग भड़की है ||

हाफिज़ ने हँसते हुए कहा, "साहिर तुम तो दीवाने हो गए हो, महिंदर के प्यार में "

इन्ही दिनों की बात है सालाना इम्तेहान सर पे थे, हाफिज़ साइकिल पे सवार साहिर के घर की और निकल पड़े | साहिर का घर हाफिज़ के घर के रास्ते में ही पड़ता था | साहिर घर पे ही थे, हाफिज़ ने पहूँचते ही बेतक़ल्लुफ़ चाय की फरमाइश की जो जल्द आ भी गयी | साहिर के कुछ और अहबाब भी घर पर मौजूद थे | साहिर कुछ उदास नज़र आ रहे थे | उनके चेहरे को जाने कौन सा सदमा और आज़ाब घेरे था | इस तरह की उदासी साहिर के चेहरे पर हाफिज़ ने पहले कभी नहीं देखी थी, मानो वो ज़िन्दगी से हार गया हो और अपना सब कुछ लुटा बैठा हो | इस से पहले के मेज़ पर पड़ी चाय, मिठाई, फल वगैरा हाफिज़ की नज़र होते, साहिर ने उसे दूसरे कमरे में आने के लिए कहा | मालूमात से न-वाकिफ हाफिज़ साहिर के साथ दूसरे कमरे में चले गए, जहाँ साहिर सब की नज़रों और कानो से दूर कुछ बताना चाहते थे |

कमरे में दाखिल होते ही साहिर के सब्र का बाँध टूट गया और वो फूट-२ के रोने लगा | उसकी मोटी-२ आँखों से मानो सैलाब टूट पड़ा हो | वो बेहद अफ़सोस भरे भारी गले से कहने लगा, "हाफिज़ ! महिंदर नहीं रही |" हाफिज़ को इस बात का अंदाजा भी नहीं था वो इस खबर को सुन और दोस्त को दुखी देख बहुत उदास हुआ | हाफिज़ के सामने महिंदर का वजूद जिंदा होकर घूमने लगा | महिंदर हाफिज़ की जमात में ही पढती थी | वो इखलाक और खुश मिज़ाज वाली अव्वल दर्जे की ज़हीन लड़की थी | कॉलेज में चलते-२ एक ऐसा फिकरा कस देती थी के सुनने वाले हक्के-बक्के रह जाते थे | चंचल फितरत, नरम लहज़ा, ख़ूबसूरत आँखें; अभी तक हाफिज़ को यकीन नहीं हो रहा था के महिंदर अल्लाह को प्यारी हो गयी है | ऐसा लग रहा था मानो बहार की रुत में पहले-पहल खिले गुल को किसी ने बड़ी बेरुखी से शाख से अलग कर दिया हो |

तुम न जाने किस जहाँ में खो गए
हम भरी दुनिया में तनहा हो गए

मौत भी आती नहीं, आस भी जाती नहीं
दिल को यह क्या हो गया, कोई शैय भाती नहीं
लूट कर मेरा जहाँ, छुप गए हो तुम कहाँ

एक जाँ और लाख ग़म, घुट के रह जाए न दम
आओ तुम को देख लें, डूबती नज़रों से हम
लूट कर मेरा जहाँ, छुप गए हो तुम कहाँ

तुम न जाने किस जहाँ में खो गए
हम भरी दुनिया में तनहा हो गए

महिंदर कुछ वक़्त से बीमार थी और बीमारी धीरे-२ बढती जा रही थी | उसे तपेदिक हो गया था | आला दर्जे के इलाज़ और एहतियात के बावजूद वो मौत के चुंगल से बाहर नहीं निकल पाई | आखिरकार उसकी चलती-फिरती, हंसती-खेलती ख़ूबसूरत ज़िन्दगी हमेशा के लिए खामोश हो गयी | साहिर बहुत देर से चुप-चाप खड़े रोता रहा |

आखिर साहिर ने बेहद आजीज़ी (बेबसी) के साथ कहा, "हाफिज़ ! क्या तुम मेरे लिए महिंदर चौधरी की एक तस्वीर मुहईया करा सकते हो | मैं तुम्हारा उम्र-भर अहसानमंद रहूँगा" | हाफिज़ से साहिर की ये हालत देखी नहीं जा रही थी, उसे अचानक महिंदर की दोस्त और हम-जमाती शीला का ध्यान आया और दोनों उसके घर की तरफ रवाना हो गए | उन्हें उम्मीद थी के वो ज़रूर कुछ बंदोबस्त कर सकती है | साहिर वैसे ही दुबला-पतला था, महिंदर के ग़म ने उसे एक दम सूखे पत्ते की मानिंद कर दिया था | वो इस हालत में भी नहीं था के शीला के घर पहूंचने के बाद उसे जोर से आवाज़ दे सके | लिहाज़ा हाफिज़ ने शीला को पुकारा और जल्द ही शीला बाहर भी आ गयी | उसने भी पहला ज़िक्र महिंदर की मौत का ही किया और वो उसी के घर अफ़सोस करने जा रही थी | अब ये तीनों लोग महिंदर के घर की तरफ चल पड़े और रास्ते में शीला से महिंदर की एक तस्वीर मुहैया कराने की दरख्वास्त भी कर डाली | शीला पहले तो थोडा सोचने लगी लेकिन साहिर की हालत देखकर, जिसका मानो अंग-२ इल्तेज़ा कर रहा हो, कोशिश करने के लिए मान गयी | महिंदर के घर पहूंचने के बाद साहिर और हाफिज़ घर के बाहर घास पर बैठ गए और शीला अन्दर चली गयी | शाम की परछाईयाँ किसी करीबी के ग़म की तरह लम्बी होती जा रही थीं | सूरज भी रंज और अफ़सोस में डूबा अपनी आखिरी किरणों को बिखराता हुआ अस्त हो गया |

आखिरकार शीला ग़म में डूबी, उदास, महिंदर की लाश को देखकर बाहर आई | उसने ग़म से निढाल हालत में बिना साहिर और हाफिज़ से कुछ बात किये महिंदर की तस्वीर साहिर के हाथ में थमा दी और वहां से चल दी | साहिर अहसानमंद आँखों से हाफिज़ को देख रहा था और मन ही मन शीला का तह-ऐ-दिल से शुक्रिया कर रहा था | साहिर तस्वीर को इस तरह गले लगा रहा था मानो महिंदर को गले लगा कर दिल के जज़्बात और अहसास बयान कर रहा हो | उदासी और परेशानी भरी ये शाम किसी मुफलिस की भूख की तरह दाएम् (perpetually) बढ़ी जा रही थी और इसी आलम में ये दोनों दोस्त आजुर्दा घर की तरफ बढने लगे |

अगले दिन जब दोनों दोस्तों की मुलाक़ात हुई तो मालूम हुआ के साहिर लाहौर जाने की तैयारी कर रहे थे | हैरान हाफिज़ ने पुछा, "लाहौर में क्या काम है ?" साहिर ने जवाब दिया, "महिंदर की तस्वीर को बड़ा कराना है | यहाँ कोई भी इसे ख़ूबसूरत तरीके से बड़ा नहीं कर पायेगा | बड़ा कराने के बाद मैं इसे अपने गोल कमरे (drawing room) में लगाऊँगा | महिंदर हर वक़्त मेरे साथ रहेगी और मैं उस से बातें करूंगा | "

साहिर की इस बेपनाह आशिकी की दूसरी मिसाल मिलना नामुमकिन न हो तो मुश्किल ज़रूर होगा | उनके गुदाज़ मिज़ाज और दीवानगी का असर उनकी शायरी में देखने को बखूबी मिलता है | यही वजह है के साहिर ज़िन्दगी में किसी भी मंसूबे या मसले को जब तस्लीम करते थे तो उसका लाजिम-ओ-मल्जूम (inseparable) हिस्सा बन कर अंजाम तक पहूँचाने में जुट जाते थे |

जो लोग साहिर को जानते हैं, वो ये भी जानते हैं के साहिर का किसी एक बात या अहसास पे टिके रहना न-मुमकिन सा होता था | लेकिन अब की बार न जाने साहिर को क्या हो गया था | हाफिज़ को भी यही लगता था के साहिर की ये नफ्सियाती (psychological) हालत वक्ती है और जल्द ही वो सब भूल जायेगा | किसी तरह सुबह से शाम हुई, हाफिज़ फिर साहिर के पास पहुंचे ये जानने के लिए के वो लाहौर गए या नहीं | साहिर घर पर ही थे, यानी लाहौर नहीं गए | हाफिज़ ने कोई दलील नहीं मांगी क्योंकि वो साहिर को बेहतर जानते थे | इस तरह कुछ दिन बीत गए और अहिस्ता-२ साहिर के ज़हन से महिंदर का तसव्वुर भी जाता रहा |

बहरहाल, इस इश्किया हादसे ने साहिर के दीवान में एक नज़्म जिसका उन्वान था 'मरघट', का इजाफा ज़रूर किया | ये वो वक़्त था जब जज़्बे की शिद्दत ज़बर पे थी | साहिर महिंदर के जनाज़े में भी गया था और उसने महिंदर को आतिशों के दरम्यान रोशन होते भी देखा | उसने देखा था; वो ख़ूबसूरत आंखें जो चुप रहकर भी बातें करती थी, दहकते शोलों की नज़र हो गयी | वो ज़िन्दगी से लबरेज़, मुस्कुराता चेहरा, ज़िन्दगी की आखिरी सच्चाई को हासिल हो कर खाक हो चूका था |

कौसर में वो धुली हुई बाहें भी जल गयीं
जो देखती थीं मुड़-मुड़ के, वो निगाहें भी जल गयीं ||

वक़्त के साथ-२ साहिर के दिल से महिंदर की मूरत धुंदली होती गयी | साहिर बहुत जज़्बाती इंसान थे, उनकी तबियत में ठहराव नहीं था और वो अपने हर एक रूमानी हादसे को नज़्म की शक्ल देने के बाद ये समझता था के उसका मकसद पूरा हो गया है | साहिर की हर एक नज़्म किसी न किसी हादसे की पैदावार है |

साहिर की एक और नज़्म "किसी को उदास देखकर" जो तल्खियां में शामिल है, भी एक ज़ाती इश्किया अहसाह की एक दास्तान है, जो कॉलेज के ज़माने में हुआ था |

ये कॉलेज के दिनों की ही बात है, जब साहिर एक और बार इश्क में मुब्तिला हो गए | हम सब जानते हैं के कॉलेज के दिन नौ-उमरी, शबाब, जोश, जूनून और बगावत के दिन होते हैं | ये ज़िन्दगी का वो हिस्सा होते हैं जिन्हें ज़्यादातर तफरी-पसंद लोग गाफिल हो के जीना चाहते हैं | बेबाकी और दिल-लगी के ये दिन हर किसी की ज़िन्दगी का हिस्सा होते हैं और अगर शक्स साहिर की फितरत का हो यानि जज़्बाती और हर-दिल अज़ीज़ तो हादसे तो होने ही हैं | खैर अब की बार साहिर को ईशर कौर नाम की लड़की से प्यार हो गया |

ईशर एक दुबली, पतली, तीखे नैन-नक्शों वाली लड़की थी | उसकी आधी खुली आंखें, उसके चेहरे की लकीरें, नरम-नाज़ुक जुस्सः (body) मुस्सविर के तस्सवुर की जीती जागती कामिल मूरत थी | ईशर हर वक़्त कुछ खोई-२ रहती थी | उसकी कैफिअत, उसका मिज़ाज, उसके अंदाज़; दूसरी लड़कियों से एक दम मुक्तलिफ़ थे |

ईशर कौर कॉलेज के हॉस्टल में रहती थी जो कॉलेज से काफ़ी करीब था | लडकियां अक्सर पैदल ही कॉलेज से आती जाती थीं | पहली दफा तो खुदा जाने साहिर ने ईशर को कब देखा और पसंद किया लेकिन अब जो उसकी हालत थी वो देखने जैसी थी | साहिर अक्सर एक कंधे को दीवार से सटा कर, बाजूओं को तय (fold) कर के, वजन अपनी जिराफ़ जैसी एक टांग पर डाल के और दूसरी टांग को नोकीले पंजे पर टिका कर कॉलेज के किसी न किसी गोशे से सर-बस्तगी (clandestinely)से ईशर को तका करता था | ईशर इसीलिए खुद को अपनी सहेलियों के बीचो-बीच छुपा के साहिर की नज़रों से बचकर चलती थी | इन दिनों साहिर की शायरी का एक ही मौज़ू था 'ईशर'| साहिर को ईशर, एक नगमे की मानिंद जान पड़ती थी, जिस कि आवाज़ वो बन सकता था |

साहिर कॉलेज यूनियन के सदर बन चुके थे | पुर-एहसास की जानिब से कहें तो अब तक साहिर महिंदर को भुला चुके थे, बेशक ज़ेहन के किसी गोशे में दफ्न ये मुहब्बत एक आतिश-फिशां (volcano) की मानिंद थी जो माज़ी-परस्ती (nostalia) में एहसास के ज़लज़ले के भड़काने से फूट सकता था | बहरहाल, अभी ईशर का जादू साहिर के सर चढ़ के बोल रहा था |

ऐसे ही एक रोज़ साहिर ने शायद ईशर के करीब रहने के लालच में उसे यूनियन के जलसे में शामिल होने के लिए कहा | इस अचानक सवाल से ईशर पर एक अजीब सी कैफ़िअत सवार हो गयी | वो लड़की जो अपने आप से भी शर्माती थी, वो भला इतने सारे लड़के-लड़कियों के बीच क्या कहेगी, इस डर और फ़िक्र से उसके हाथ-पांव फूल रहे थे | उसने तरद्दुद (hesitant) करते हुए साहिर से कहा, के वो वहां क्या करेगी, उसे तो कुछ भी नहीं आता | साहिर ने मौका पा कर ईशर को वो करने के लिए कहा जिसमे सारा कॉलेज उसका लोहा मानता था | वो था गाना गाने का मशवरा | साहिर ने कहा के कोई क़ौमी गीत गा देना | साहिर और उसके दोस्तों ने कई मर्तबा लड़कियों के हॉस्टल के बाहर से लड़कियों के गाने की आवाजें सुनी थी, जिनमे ईशर भी शुमार होती है | साहिर हर मुमकिन कोशिश कर रहे थे ईशर को राज़ी करने के लिए और ईशर ज़मीन में नज़रे गड़ाये साहिर की बातें सुन रही थी |

साहिर की इस हौसला-अफज़ाई का जायेज़ा हॉस्टल की लडकियां कुछ दूरी से ले रही थीं जो साहिर के पुराने इश्क़ से भी वाक़िफ थीं | हॉस्टल में बातों के इस चर्चे को फैलते देर नहीं लगी, मानों बातों को पर लग गए हों | अब सारे हॉस्टल में इस नए इश्क़ की दास्ताँ जो अभी ठीक तरह से शुरू भी नहीं हुयी थी का चर्चा होने लगा |

इस बात को हुए कुछ रोज़ गुज़र चुके थे | साहिर ने खुदा जाने अपने दिल में ईशर कौर के लिए पनपती मोहब्बत के चलते या ईशर की दिलकश आवाज़ के जादू के चलते एक बार और फरमाइश करने की सोची | ईशर की आवाज़ दरहकीक़त दिलकश थी और कॉलेज की लड़कियां तो यहाँ तक कहती थीं के उसके गले में रूहानी असर है | इन सब बातों के बावजूद, ईशर ने कभी किसी जलसे या महफ़िल में शिरक़त नहीं की थी | वो अपनी खल्वत (solitude) और तसव्वुर के बसे-बसाये जहां से बहार नहीं निकलना चाहती थी, इसकी दूसरी वाज़ेह वजह न-खुद-एतमादी (lack of self-confidence) भी हो सकती है | बहरहाल, उसने साहिर से मुआफी मांगी और शिरकत करने से इनकार कर दिया | अब ये साहिर के लिए खुद्दारी और खुद-शनासी (who understands and reacts according to a given situation and can weigh himself) का मसला हो गया था | साहिर ने हार नहीं मानी और किसी तरह ईशर को जलसे में गाने के लिए राज़ी कर दिया | साहिर को लग रहा था मानो उसने कोई क़िला फ़तेह कर लिया हो, वो दीवानों की तरह खुश था |

जलसे में ईशर की गायकी से सारे तालिब-ए-इल्म मुतास्सिर हुए बगैर नहीं रह पाए | हमेशा सहमी-२ और शरमाई सी रहने वाली लड़की अचानक इस नए रंग में पूरे कॉलेज में छा गयी थी | जो लड़की पहले किसी को नज़र भी नहीं आती थी अब हर-दिल अज़ीज़ हो गयी थी और ईशर को भी इस कारनामे के बाद खुद पर यकीन हो चला था | अभी साहिर अपनी इस कामयाबी पर इतराते, के उन्हें एक नए खौफ ने घेर लिया | ये था ईशर के चाहने वालों का इज़ाफा |

मेरे ख्वाबों के झरोकों को सजाने वाली
तेरे ख्वाबों में कहीं मेरा गुज़र है कि नहीं
पूछकर अपनी निगाहों से बतादे मुझको
मेरी रातों की मुक़द्दर में सहर है कि नहीं

चार दिन की ये रफ़ाक़त जो रफ़ाक़त भी नहीं
उमर् भर के लिए आज़ार हुई जाती है
जिन्दगी यूं तो हमेशा से परेशान सी थी
अब तो हर सांस गिरांबार हुई जाती है

मेरी उजड़ी हुई नींदों के शबिस्तानों में
तू किसी ख्वाब के पैकर की तरह आई है
कभी अपनी सी कभी ग़ैर नज़र आती है
कभी इख़लास की मूरत कभी हरजाई है

प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी
तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं
तूने ख़ुद अपने तबस्सुम से जगाया है जिन्हें
उन तमन्नाओ का इज़हार करूं या न करूं

तू किसी और के दामन की कली है लेकिन
मेरी रातें तेरी ख़ुश्बू से बसी रहती हैं
तू कहीं भी हो तेरे फूल से आरिज़ की क़सम
तेरी पलकें मेरी आंखों पे झुकी रहती हैं

तेरे हाथों की हरारत तेरे सांसों की महक
तैरती रहती है एहसास की पहनाई में
ढूंढती रहती हैं तख़ईल की बाहें तुझको
सर्द रातों की सुलगती हुई तनहाई में

तेरा अल्ताफ़-ओ-करम एक हक़ीक़त है मगर
ये हक़ीक़त भी हक़ीक़त में फ़साना ही न हो
तेरी मानूस निगाहों का ये मोहतात पयाम
दिल के ख़ूं का एक और बहाना ही न हो

कौन जाने मेरी इम्रोज़ का फ़र्दा क्या है
क़ुबर्तें बढ़ के पशेमान भी हो जाती है
दिल के दामन से लिपटती हुई रंगीं नज़रें
देखते देखते अंजान भी हो जाती है

मेरी दरमांदा जवानी की तमाओं के
मुज्महिल ख्वाब की ताबीर बता दे मुझको
तेरे दामन में गुलिस्ता भी है, वीराने भी
मेरा हासिल मेरी तक़दीर बता दे मुझको

साहिर इस बात को लेकर बहुत खुश थे के ईशर ने उनकी पेशकश को ठुकराया नहीं | अब दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगीं | ईशर में भी कहीं से हिम्मत आ गयी थी, मोहब्बत का ये बीज दोनों दिलों में बोया जा चूका था | मुलाकातें लम्बी और गहरी होती गयीं | साहिर के आस पास गुनगुनाते गीतों की एक दुनिया आबाद हो चली थी | सारे तालिब-ऐ-इल्म दोनों को सवाल भरी निगाहों से तकते थे और सारे कॉलेज में हर इक की जुबां पर इस मोहब्बत का चर्चा था | ईशर कौर के हॉस्टल की लडकियां उसे खूब छेड़ती और तरह-2 की बातें करती जिनका अमूमन हकीकत से कोई वास्ता भी नहीं होता | ईशर को ये सब कुछ न चाहते हुए भी बर्दास्त करना पड़ता | जल्द ही ये चर्चा कॉलेज की हदों को लांघ कर शहर में आम हो गया | ईशर को वालदेन और बदनामी का खौफ सताने लगा | जहाँ एक तरफ मोहब्बत की रंगीनियों में दिन गुज़रते वहां दूसरी तरफ ईशर रात भर जाग के इस के अंजाम को लेकर घबराती |

आखिरकार उसने एक दिन कुछ मन ही मन में तय करके साहिर से मिलने का फैसला किया | साहिर इन सब बातों से बेख़बर ईशर से मिलने आया और ये जानकार बहुत उदास हुआ के ईशर के जेहन में क्या कुछ चल रहा है | ज़ाहिर हैं के साहिर भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते थे के लडकियों के लिए उस ज़माने में इस तरह के चर्चे बदनामी के साथ-२ बद-किस्मती भी लाते थे | ईशर के लिए ये फैसला करना निहायती मुश्किल था के अब वो साहिर से नहीं मिल पायेगी | किसी तरह ये आज़ार-देह (distressful) मुलाक़ात ख़त्म हुई और दोनों अपना-२ सा मुंह ले कर जुदा हो गए | अब अक्सर दोनों खोये-२ और उदास से रहने लगे | ईशर अक्सर हॉस्टल में कमरा बंद करने फूट-२ के रोती थी | साहिर खुद बहुत बेबस सा इस अचानक फैसले से बहुत सदमे में था | ऐसे ही एक लम्हे में साहिर ने 'किसी को उदास देख कर' नज़्म लिखी और ईशर की ज़िन्दगी को एहसास और शेर का लिबास पहना दिया | कॉलेज का हर एक लड़का-लड़की ये जानता था के साहिर की ये नज़्म ईशर के लिए है, जिस से इस चर्चे ने और तूल पकड़ लिया |

तुम्हें उदास सा पाता हूँ मैं काई दिन से
ना जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम
वो शोख़ियाँ, वो तबस्सुम, वो कहकहे न रहे
हर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुम
छुपा छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनी
ख़ुद अपने राज़ की ताशीर बन गई हो तुम

मेरी उम्मीद अगर मिट गई तो मिटने दो
उम्मीद क्या है बस एक पास-ओ-पेश है कुछ भी नहीं
मेरी हयात की ग़मग़ीनीओं का ग़म न करो
ग़म हयात-ए-ग़म यक नक़्स है कुछ भी नहीं
तुम अपने हुस्न की रानाईओं पर रहम करो
वफ़ा फ़रेब तुल हवस है कुछ भी नहीं

मुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूं शिकायत हो
मेरी फ़ना मीर एहसास का तक़ाज़ा है
मैं जानता हूँ के दुनिया का ख़ौफ़ है तुम को
मुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया है
यहाँ हयात के पर्दे में मौत चलती है
शिकस्त साज़ की आवाज़ में रू नग़्मा है

मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं
मेरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुम
ये तुम ने ठीक कह है तुम्हें मिला न करूँ
मगर मुझे बता दो कि क्यूँ उदास हो तुम
हफ़ा न हो मेरी जुर्रत-ए-तख़्तब पर
तुम्हें ख़बर है मेरी ज़िंदगी की आस हो तुम

मेरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगा
मगर ख़ुदा के लिये तुम असीर-ए-ग़म न रहो
हुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लिया
यहाँ पर कौन हुआ है किसी का सोचो तो
मुझे क़सम है मेरी दुख भरी जवानी की
मैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो

मैं अपनी रूह की हर एक ख़ुशी मिटा लूँगा
मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकता
मैं ख़ूद को मौत के हाथों में सौंप सकता हूँ
मगर ये बर-ए-मुसाइब उठा नहीं सकता
तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझे
निजात जिन से मैं एक लहज़ पा नहीं सकता

ये ऊँचे ऊँचे मकानों की देवड़ीयों के बताना या कहना
हर काम पे भूके भिकारीयों की सदा
हर एक घर में अफ़्लास और भूक का शोर
हर एक सिम्त ये इन्सानियत की आह-ओ-बुका
ये करख़ानों में लोहे का शोर-ओ-गुल जिस में
है दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्मा

ये शरहों पे रंगीन साड़ीओं की झलक
ये झोंपड़ियों में ग़रीबों के बे-कफ़न लाशें
ये माल रोअद पे करों की रैल पैल का शोर
ये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्दरू बच्चे
गली गली में बिकते हुए जवाँ चेहरे
हसीन आँखों में अफ़्सुर्दगी सी छाई हुई

ये ज़ंग और ये मेरे वतन के शोख़ जवाँ
खरीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिनकी
ये बात बात पे कानून और ज़ब्ते की गिरफ़्त
ये ज़ीस्क़ ये ग़ुलामी ये दौर-ए-मजबूरी
ये ग़म हैं बहुत मेरी ज़िंदगी मिटाने को
उदास रह के मेरे दिल को और रंज़ न दो

जहाँ एक तरफ साहिर बतौर शायर और इंकेलाबी मशहूर हो रहे थे वहीँ दूसरी तरफ कॉलेज के अरबाब-ऐ-बसतो-कुशाद (senior management) को ये बात नागवार गुजर रही थी | खैर साहिर इन सब बातों से बेख़बर इश्क और इन्केलाब के जूनून में चूर थे | इंसानी नफ़्सिआत के इन्तेहाई एहसासात से गुज़र रहे साहिर, ईशर कौर के इश्क में मुब्तिला हो चुके थे | ईशर से मुलाक़ातों का सिलसिला रोज़-ब-रोज़ बढ रहा था | कॉलेज में छुट्टियाँ हो गयी थी और हॉस्टल में थोड़ी सी लडकियां जो घर नहीं गयी थी रुकी हुयीं थीं | साहिर को ईशर से मिले काफी रोज़ हो गए थे, वैसे भी इश्क के मारों को एक-२ दिन एक-२ बरस की तरह जान पड़ता है | साहिर ईशर से मिलने के लिए तड़प रहे थे, खुदा जाने साहिर ने किस तरह ईशर कौर को कॉलेज बुला भेजा | आखिरकार दोनों सुनसान कॉलेज में शाम के वक़्त वरामदे में मिले | साहिर ईशर को देखते ही फूट-२ के रोने लगे | इतना लम्बा-चौड़ा लड़का, एक लड़की के सामने रोता हुआ कैसा लगेगा, ईशर भी साहिर को इस हाल में देख कर और परेशान हो गयी | ईशर ने मौके की नज़ाक़त को समझते हुए, साहिर को शांत किया और दोनों एक बार फिर मोहब्बत की रंगीन दुनिया में खो गए | इन दोनों की इस मुलाक़ात का कॉलेज के principal को किसी तरह पता चल गया | साहिर की इंकेलाबी सरगर्मियों और एंटी-वार फ्रंट की नज्में पढने से अरबाब-ऐ-बसतो-कुशाद पहले से ही ऐतराज़ ज़ाहिर कर चुके थे, बाक़ी रही सही कसर इस मुलाक़ात ने पूरी कर दी | लिहाज़ा साहिर को कॉलेज छोड़ना पड़ा | साहिर ने न सिर्फ कॉलेज छोड़ा बल्कि लाहौर मंत्किल (transfer) हो गए | जहाँ इन्होने 'दयाल सिंह कॉलेज' में दाखिला ले लिया | इस दौर के इन जज़्बात और अहसासात को इनकी नज़्म "नज़र-ए-कॉलेज' में महसूस किया जा सकता है |

ऐ सर ज़मीने पाक के याराने नेक नाम
बसद-खलूस शायर-ऐ-आवारा का सलाम

ऐ वादी-ऐ-जमील मेरे दिल की धड़कनें
आदाब कह रही हैं तेरी बारगाह में

तू आज भी है मेरे लिए जन्नत ख्याल
है तुझ मैं दफ़न मेरी जवानी के चार साल

कुम्हलाये हैं यहाँ मेरी ज़िन्दगी के फूल
इन रास्तों में दफ़न हैं मेरी ख़ुशी के फूल

तेरी नवाजिशों को भुलाया न जायेगा
माज़ी का नक्श दिल से मिटाया न जायेगा

तेरी निशात-खेज़ फिज़ा-ऐ-जवान की ख़ैर
ग़ुल है रंग-ओ-बू के हसीं कारवां की ख़ैर

दूर ऐ-खिज़ां में भी तेरी कलियाँ खिली रहें
ता-हश्र ये हसीं फिजायें बसी रहें

हम इक ख़ार थे जो चमन से निकल गए
नग-ऐ-वतन थे हद-ऐ-वतन से निकल गए

गाये हैं फिजा मैं वफाओं के राग भी
नगमात-ऐ-आतशी भी बिखेरी है आग भी

सरकश बने हैं गीत बग़ावत के गाये हैं
बरसों नए निज़ाम के नक्शे बनाये हैं

नगमा निशात-ऐ-रूह का गाया है बारहा
गीतों में आंसुओं को छुपाया है बारहा

मासूमियों के जुर्म में बदनाम भी हुए
तेरे तुफैल मुराद-ऐ-इलज़ाम भी हुए

इस-सर-ज़मीन पे आज हम इक बार ही सही
दुनिया हमारे नाम से बेज़ार ही सही

लेकिन हम इन फिजाओं के पाले हुए तो हैं
गर यां नहीं तो यां से निकले हुए तो हैं

साहिर जाने ख्यालों में कितनी देर खोये रहे, वक़्त का हिसाब न साहिर को था न वक़्त को खुद | इस बीच वो सुस्त दोपहर कब शाम में तब्दील हो गयी और जाने कहाँ से अब्र सैलाब की सौगात ले आये, साहिर को कुछ पता नहीं चला | ईशर से इस तरह जुदा होना और मौसम के मिजाज़ का अचानक बदलना सब कुछ अनचाहा सा था | रूमानी दोपहर फुरक़त के अश्कों में भीग चुकी थी | मौसम भी माज़ी से लम्हों को चुरा कर साहिर की कहानी बयान कर रहा था |

अभी साहिर एहद-ऐ-हाज़िर हुए ही थे के इब्ने इंशा, अहमद राही और अब्दुल हामिद जो बिना नागा साहिर से मिलने अदब-ऐ-लतीफ़ के दफ्तर में आते थे, पहुँच गए | इन हज़रात की आमद का मकसद अदबी गुफ्तगू और मुमताज़ होटल में जाकर ज़ायकेदार केक खाने की गरज़ होता था | मुमताज़ होटल में ये थोड़ी सी तफरी को ये हज़रात अय्याशी से कम तसव्वुर नहीं करते थे | ऐसे ही एक रोज़ साहिर और हामिद; चौधरी नज़ीर अहमद के दफ्तर में बैठे थे | साहिर ने सभी को नया इदारा से शाए होने वाले उसके पहले मजमूए 'तल्खियां' को तोअफे के तौर पर पेश किया | साहिर जितने बड़े शायर थे उतने ही बड़े दिल के मालिक भी, अक्सर कोई न कोई माली मद्दद मांगने साहिर के पास आ ही जाता था | हामिद ने जैसे ही एक नयी कहानी के लिए कुछ कुछ पैसों का इरादा ज़ाहिर किया, साहिर तपाक से मुस्कुराते हुए बोले, "“दोस्तों, कभी-२ सिर्फ मुझसे मिलने के लिए ही आ जाया करो | ”. ख़ैर सभी जानते थे के साहिर दिलदार इंसान है और मुसंनिफों की मद्दद के लिए वो हमेशा तैयार रहता था | जब भी साहिर की माली हालत अच्छी होती वो दोस्तों पे लुटा देता और कंगाली के दिनों में कहता, "दोस्तों, मेरी जेबें आज तुम्हारी तरह खाली हैं, लेकिन कल आना अल्लाह ने चाहा तो कुछ न कुछ तुम्हारा इंतज़ार कर रहा होगा |"

अक्तूबर १९४५ में हैदराबाद में ऑल-इंडिया तरक्की पसंद मुसन्नाफीं (writers) की कोन्फेरेंस में शिरक़त करने के बाद गोया एक और दुनिया साहिर से जाती तौर पर मूतआरुफ़ हो गयी | हैदराबाद की कौन्फेरेंस के बाद साहिर को दोस्तों एक नयी टोली मिल गयी थी | इसके बाद ये टोली जिसमें सज्जाद, कृशन अदीब, सरदार जाफरी और मजाज़ वगैरह शामिल थे साहिर को हमराह बम्बई ले गयी |

इन दिनों ललित चन्द्र मेहता 'आज़ादी की राह पर' नाम की एक फिल्म बना रहे थे, जिसमें पृथ्वी राज कपूर, हामिद अख्तर, जगदीश सेठी, जमशेदजी और जयराज वगैरह काम कर रहे थे | साहिर को इस फिल्म के लिए नगमे लिखने का मौक़ा मिला | साहिर ने इस फिल्म में जी डी कपूर की मौसीकी में ४ नगमे लिखे जिनमें "'बदल रही है ज़िन्दगी", "मेरे चरखे में जीवन का रंग सखी", "भारत जननी तेरी जय हो" और "जाग उठा है हिन्दोस्तान" शामिल हैं | फिल्म कुछ ख़ास कारोबार नहीं कर पाई और नगमे भी कोई जादू नहीं दिखा पाए | फिल्म कब आई और कब चली गयी कुछ पता ही नहीं चला |

अभी फिल्म का काम चल ही रहा था के बदकिस्मती से तकसीम-ऐ-हिंद का साल १९४७ आ गया | ये वक़्त हर किसी पर बहुत दुशवार गुज़रा | साहिर इस वक़्त बम्बई में थे और उन की अम्मी लुधियाना में एक दम तनहा | यूं तो मुल्क के बेशतर हिस्सों में फसादात फूट पड़े थे, लेकिन शिमाल की जानिब (northern region), खसूसन लुधियाना, उन इलाकों में से एक था जहाँ फसाद की नोएत (types) हर जावियाँ (corner) से शदीद थी | माँ लुधियाना में इन हालात से दो चार हो रही थी और हालात बद से बद-तर होते जा रहे थे | बेशक लुधियाना में साहिर के चाहने वालों की कमी नहीं थी, लेकिन हालात और इंसानी फितरत बड़ी बेबाकी से रंग बदल रहे थे | ऐसा लग रहा था मानो किसी मुसव्विर की ख़ूबसूरत तस्वीर पर किसी ने खून छिड़क दिया हो |

साहिर को माँ की फ़िक्र सता रही थी, वो किसी तरह काम छोड़कर निहायती परेशानी की हालत में दिल्ली पहुँच गए | दिल्ली के मुक्तलिफ़ रंग भी इन हालात में सिर्फ सुर्ख नज़र आ रहे थे | इंसानी वहशीपन का एक खौफनाक चेहरा, गुमराही के क़ब्ज़े में सर-ऐ-आम गली-कूचों की आबादी को रोंदता हुआ अपनी खुदगर्ज़ी के खोखले नज़रियात लिए बे-मानी मंजिल की जानिब बढ़ रहा था | इंसान, इंसान का दुश्मन बन चूका था, इंसानियत तिलमिला रही थी | हालात नाकाबिल-ऐ--बयान हद तक बुरे थे | साहिर अपने एक हिन्दू दोस्त के यहाँ ठहरे हुए थे |

जब फसादात की आग हिन्दू दोस्त के कुनबे तक पहुँचने लगी और सूरत-ऐ-हाल बे-यकीनी हो गए तो साहिर को मसलेहता ब-दिल-ऐ-न-ख्वास्ता (against wish) अपने अज़ीज़ हिन्दू दोस्त, जो की साहिर को जाने की इजाज़त नहीं दे रहे थे, का घर छोड़ना पड़ा और एक दूसरे सिक्ख दोस्त के यहाँ पनाह ले ली |

दिल्ली में साहिर ने फसादात के मनाज़िर अपनी आँखों से देखे | इंसानियत को तड़पते और एड़ियां रगड़ते पाया | साहिर ने इन दिनों के अपने जज़्बात और महसूसात को नज़्म "आज" में ज़ाहिर किया और ये नज़्म उन्होंने ११ सितम्बर १९४७ को आल इंडिया रेडियो दिल्ली से नश्र की |

वहां लाहौर में अमृता, जो पेट से थी, इस यकलख्त आये ज़लज़ले से सदमे में थी | तकसीम-ऐ-हिंद से उठे बवाल के पेश्तर लाहौर एक मरघट की मानिंद नज़र आ रहा था | हरसू जलते हुए घर, खौफ और न-उम्मीदी से भरी चीखें, खून-ओ-खून इंसानियत और घंटों तक चलने वाले कर्फ्यू | ये सब क़यामत के दिन से बदतर नज़र आ रहा था और इस क़यामत को अंजाम देने वाले कोई और नहीं नफरत फ़ैलाने वाले सियासी हुकुमरान थे | वो लोग जो आम इंसान को सीढ़ी बनाकर; मज़हब और फिरके के नाम पर गुमराह कर रहे थे | ऐसे ही एक रोज़ अमृता लाहौर के मशहूर माल रोड पर सैर करने के लिए निकली | जब से अमृता का पाँव भारी था वो अमूमन यहाँ सैर के लिए आ जाया करती थी | लेकिन ये दिन और दिनों जैसा नहीं था, अमृता ने एक सिक्ख को भागते हुए देखा, जिसके पेट के आर-पार एक खंज़र घुपा हुआ था | अमृता इस मंज़र से इस क़दर घबरा गयी के दोबारा इन हालात में घर से बहार निकलने से तौबा कर ली | अमृता हर शब् अपने घर के कोठे से लाचारी की हालत में लाहौर को जलते हुए देखती | इन मज़हबी फसादों को देख अमृता को अपने पिता की याद आ रही थी जिन्हें ऐसे ही मज़हबी ठेकेदारों के हाथों आज़ार रसानी (persecution) का शिकार होना पड़ा था | अमृता सोच रही थी, "क्या ये ज़मीन उन सभी की नहीं है जो यहाँ पैदा हुए हैं ? आखिर किस को क़त्ल करने के लिए इन लोगों ने हाथों में शमशीर उठा रखी है ?" | ज़ेहन में उठ रहे इन सवालों का जवाब आदतन वो अपने पिता से चाहती थी जो की अब इस जहाँ में नहीं थे |

अमृता अक्सर कहती, "मेरे लाहौर ने पूरी तरह से फिरका-परस्तों के आगे घुटने नहीं टेके हैं | ये एक नफरत का तूफ़ान है, वक़्त के साथ ये भी गुज़र जायेगा, ये ज्यादा दिन नहीं रहेगा | इंशा अल्लाह, फिर से अमन बहाली होगी और हम लोग एक हो जायेंगे |" जब फसाद इन्तेहाई खतरनाक थे, हरसू औरतों के अगवाह होने और जिंदा जलाये जाने की खबरें तेज़ थी तब भी औरतें अक्सर मुर्शिदों, पीरों और फकीरों की दरगाह पर जाती थीं, फिर वो चाहे हिन्दू होती, सिख या मुसलमान |

उम्मीदों के उलट वो तबाही भरा नामुराद दिन आ ही गया जब पंजाब के तकसीम का मुक्कदर तय होना था | पाकिस्तान को एक अलेहदा क़ोम बनाने का फैसला मुस्लिम लीग ने बहुत पहले ही ले लिया था | बरस १९४० में, मोहम्मद जिन्हा ने उन सब इलाकों को जमा कर जहाँ मुस्लिम ज्यादा तादाद में रहते थे, एक क़ोंम बनाने की पेशकश रखी थी, जिसे पाकिस्तान का नाम दिया जाना था | सिखों और दूसरे गैर-मुस्लिमों के लिए ये बहुत अजब और सदमे भरा फैसला था, क्योंकि ये लोग यूं तो पूरे पंजाब में फैले हुए थे, लेकिन हर इलाके में अक़लियत (minority) में थे | बरतानवी सरकार ने Sir Stafford Cripps को बरस १९४२ में नए इलाकों की तख्लीक़ (formation) की देखरेख करने के लिए मुक़र्रर किया, जो की मुसलमानों के लिए बनाये जाने थे | सिखों और गैर-मुस्लिम जमातों के नुमाईन्दों ने कमीशन के आगे एहतेजाज (protest) किया | दिल्ली से लेकर रावी के किनारों तक आबादी कुछ इस तरह बटी थी :- मुसलमान-4,505,000; सिख और गैर-मुस्लिम- 7,060,000 | यहाँ तक के सिख इलाकों जैसे पटिआला, नाभा, जींद, कपूरथला और फरीदकोट में मुसलमानों की तादाद महज़ २०% थी | ऐसे में पंजाब का बटवारा मौजूदा नुक्तों पर होना न-माकूल था | इसी बीच जब पाकिस्तान का बनना तय हो गया तो ज्ञानी करतार सिंह ने १९४३ में एक अलग इलाका 'आज़ाद पंजाब' के नाम से बनाने की पेशकश की जिसमें अम्बाला, जालंधर, लाहौर, मुल्तान और लायलपुर हल्के शामिल किये गए | अगस्त १९४४ में अमृतसर में मास्टर तारा सिंह ने एक तक़रीर के दौरान ये एलान कर दिया के सिख एक अलग क़ोम है और शिरोमणि अकाली दल ने मार्च २२, १९४६ को एक अलेहदा सिख हुकूमत का एलान कर दिया | ये वो मौक़ा था जब पंजाब के हालात संगीन होने लगे थे |

दूसरी तरफ मुस्लिम लीग और जिन्हा ने खून या पाकिस्तान की दुहार लगा रखी थी | अगस्त १६, १९४६ को मुस्लिम लीग ने Direct Action Day का नाम देकर हर एक मुसलमान से हर कीमत पर इस की हिमायत करने को कहा | मुस्लिम लीग ने गैर-दस्तूर तरीके से Muslim Nation Guards नाम की एक फ़ौज भी खड़ी कर ली | अखबारों में नफरत और हेजान-खेज़ (inflammatory) बातें लिख कर और मज़हबी हवाले देकर एक आम ईमान के पक्के हिन्दुस्तानी मुस्लिम को जिहादी बना दिया | एक पहले से मुक़र्रर रोज़ अगस्त १६, १९४६ को मुस्लिम लीग के एक इमाम H. S. Suhrawardy ने कोलकोता में मज़हबी फसाद के नाम पर क़त्ल-ऐ-आम और लूटमार का कारनामा अंजाम दिया | दहशत-गर्दी का ये खेल करीबन ४ दिनों तक चलता रहा, जिसमें १५००० से भी ज्यादा मासूम हिन्दुस्तानी मारे गए | २ सितम्बर १९४६ को नोआखाली और टिप्पेरा, जहाँ हिन्दुओं की आबादी कम थी में फसाद छूट गए |

दहशतगर्दी एक तंगदिली का सबूत है किसी मज़हब का हामिल नहीं | सियासी आरजूओं को पूरा करने के लिए कुछ चुनिन्दा इंसानियत के दुश्मनों ने तारिख में ये न-गवार वक़्त कलम कर दिया | मार्च १९४७ के बाद का वक़्त ख़ास तौर पर सिखों पर बहुत भारी था | रावलपिंडी, हजारा, लाहौर में दंगे भड़क उठे | अमृतसर में दहशतगर्दों ने Golden Temple को भी अपना निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन जथेदार उधम सिंह नागोके ने गिनती में कम सिखों के होने के ब-वजूद उन्हें वहां से खदेड़ दिया | इसी दिन अमृतसर के पास छोटे से कसबे शरीफपुर में दहशतगर्दों ने मुहाजिरों (refugees) से भारी ट्रेन को जो पाकिस्तान से आ रहे थे रोक कर उस में सवार हर एक शख्स को हालाक कर दिया | इस के बाद ज़माने से चल रहे हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे, का क़त्ल हर गली कुचे में होने लगा | दोनों मुल्कों के बीच करीबन १००००-१५००० मुहाजिरों की अदला-बदली होनी थी, लेकिन इस नफरत के चलते जाने कितने मासूम जिनका मज़हब कुछ भी रहा हो, इस हैवानियत का शिकार हो गए | इस जहालत का शिकार ज़्यादातर बच्चे और औरतें थीं, जिन्होंने अपनी आबरू बचाने के लिए कुओं तक में छलांग लगा दी | एक गाँव -थोह खालसा, जो अब पाकिस्तान में है, में करीबन १००० औरतों और बच्चों ने दहशतगर्दों के डर से आबरू और जान की सलामती के लिए कुओं में छलांग लगा दी, लेकिन जान न बचा पाए |

ये मार्च-अप्रैल १९४७ की बात है अमृता को अपने शौहर, छोटी बेटी और पेट में पल रहे बच्चे के साथ इन हालात में लाहौर छोड़ना पड़ा | अमृता को इन दिनों डॉक्टरी तवज्जो की बाकायेदा ज़रुरत पड़ती रहती थी, जो की फसाद की आग में झुलस रहे लाहौर में मिल पाना न-मुमकिन था | इन हालात में बच्चे के लिए हर ज़रुरत की चीज़ मिलना भी मुश्किल था फिर वो दूध या दवा ही क्यों न हो | वो ये सोच कर लाहौर से जा रही थी के बच्चे की पैदाइश के बाद वापिस लौट आएगी, और तब तक इंशा अल्लाह हालात भी सुधर जायेंगे | ये सोचकर के वापिस आना ही है, अमृता ने जाड़ों के कपड़े भी लाहौर में ही छोड़ दिए और सिर्फ एक सुर्ख रंग की शॉल साथ ले ली | उसने अपना किमती पसंदीदा नवरतनों से जड़ा हार भी वहीँ अलमारी में रख दिया | उसे ख़ास तौर पर दो दोस्तों से बिछड़ने का अफ़सोस था , इस कता-ऐ-ताल्लुक को वो लाहौर वापिस आकर रफू करने की ख्वाईश रखती थी | इन में एक थे साहिर और दूसरे सज्जाद | साहिर और सज्जाद को खोने के डर ने भी उसे ये सब करने पर आमादा कर दिया, अगर कुछ पीछे छोड़ जाती तो वापिस आने की वजहें बढ़ जातीं |

मई १९४७ में अमृता अपने कुनबे के साथ लाहौर से देहरादून के लिए ट्रेन से निकल पड़ी | देहरादून में नवराज (जुलाई) के जन्म के बाद अमृता को रोज़ी-रोटी की फिक्र होने लगी | देहरादून में उसे नौकरी की कोई उम्मीद नहीं थी, लिहाज़ा उसने दिल्ली के आल इंडिया रेडियो में नौकरी के लिए अर्जी दी, जो जल्द ही मंज़ूर भी हो गयी | वैसे तो ये नौकरी एक अहद-नामे के तहत थी और इस से होने वाली आमदनी जो की पांच रुपये रोज़ा थी, न-काफी थी, लेकिन कुछ न होने से अच्छी थी |

ये सर्दियों के दिन थे और अमृता के पास सिर्फ एक सुर्ख शाल था | देहरादून से दिल्ली के सफ़र में ठण्ड बहुत थी, ऐसे में बच्चों को ठण्ड से बचाने के लिए उसने शाल को दो हिस्सों में तकसीम कर के दोनों को ढांप दिया | ये उसका मुहाजिर साबित होने का पहला तजुर्बा था | इस सफ़र के दौरान जो अमृता ने देखा वो एक भयानक ख्वाब सा था | बेघर लोग मुहाजिर (refugees) हुए जाने ज़मीन में नज़रें गड़ाये क्या ढूंढ रहे थे, शायद ख़ाक में मिली तकदीर को कोस रहे थे | कोई अपनों के जाने के ग़म में चूर था और कोई ज़िन्दगी भर की कमाई खोने के ग़म में | अपने ही वतन में बे-वतनों की मानिंद धक्के खा रहे थे | जाने कितने ही मासूमों के अगवाह होने, मारे जाने और औरतों और बच्चियों के साथ हुयी ज़बरदस्ती की खबरें पढने और सुनने में आ रही थीं | चलती ट्रेन से, अँधेरे में डूबा बाहर का नज़ारा ऐसा था मानो ज़मीन पर क़ब्रों की फसल उग आई हो | ऐसे में अमृता को वारिस शाह का वो कलाम रह-२ कर याद आ रहा था जो उसने हीर के फ़साने को बयान करने के लिए लिखा था और जो हर किसी की ज़बान पर चढ़ा हुआ था | अमृता भी अपनी नज़्म में वारिस शाह से पूछती है:

आज्ज आखां वारिस शाह नूं
कित्थे कबरां विचों बोल ते आज्ज किताबे ईश्क दा
कोई अगला वर्का फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी तूं लिख लिख मारे वैण
आज्ज लखां धिया रोंदियां तैनूं वारिस शाह नूं कैण
उठ दर्दमंदा देया दर्दिया उठ तक्क अपना पंजाब
आज्ज वेले लाशा विछियां ते लहू दी भरी चिनाव
किसे ने पंजा पाणियां विच दित्ती जहर रला
ते उणा पाणियां धरत नूं दित्ता पानी ला
इस जरखेज जमीन दे लू लू फुटिया जहर
गिट्ठ गिट्ठ चड़ियां लालियां ते फुट फुट चड़िया कहर
उहो वलिसी वा फिर वण वण वगी जा
उहने हर इक बांस दी वंजली दित्ती नाग बना
नागां किल्ले लोक मूं, बस फिर डांग्ग ही डांग्ग,
पल्लो पल्ली पंजाब दे, नीले पै गये अंग,
गलेयों टुट्टे गीत फिर, त्रखलों टुट्टी तंद,
त्रिंझणों टुट्टियां सहेलियां, चरखरे घूकर बंद
सने सेज दे बेड़ियां, लुड्डन दित्तीयां रोड़,
सने डालियां पींग आज्ज, पिपलां दित्ती तोड़,
जित्थे वजदी सी फूक प्यार दी, ओ वंझली गयी गवाच,
रांझे दे सब वीर आज्ज भुल गये उसदी जाच्च
धरती ते लहू वसिया, कब्रां पइयां चोण,
प्रीत दिया शाहाजादियां अज्ज विच्च मजारां रोन,
आज्ज सब्बे कैदों* बन गये, हुस्न इश्क दे चोर
आज्ज कित्थों लाब्ब के लयाइये वारिस शाह इक होर
वारिस शाह से
आज वारिस शाह से कहती हूं
अपनी कब्र में से बोलो
और इश्क की किताब का
कोई नया वर्क खोलो
पंजाब की एक बेटी रोई थी
तूने एक लंबी दस्तांन लिखी
आज लाखों बेटियां रो रही हैं,
वारिस शाह तुम से कह रही हैं
ए दर्दमंदों के दोस्त
पंजाब की हालत देखो
चौपाल लाशों से अटा पड़ा हैं,
चिनाव लहू से भरी पड़ी है
किसी ने पांचों दरियाओं में
एक जहर मिला दिया है
और यही पानी
धरती को सींचने लगा है
इस जरखेज धरती से
जहर फूट निकला है
देखो, सुर्खी कहां तक आ पंहुंची
और कहर कहां तक आ पहुंचा
फिर जहरीली हवा वन जंगलों में चलने लगी
उसमें हर बांस की बांसुरी
जैसे एक नाग बना दी
नागों ने लोगों के होंठ डस लिये
और डंक बढ़ते चले गये
और देखते देखते पंजाब के
सारे अंग काले और नीले पड़ गये
हर गले से गीत टूट गया
हर चरखे का धागा छूट गया
सहेलियां एक दूसरे से छूट गयीं
चरखों की महफिल विरान हो गयी
मल्लाहों ने सारी कश्तियां
सेज के साथ ही बहा दीं
पीपलों ने सारी पेंगें
टहनियों के साथ तोड़ दीं
जहां प्यार के नगमे गूंजते थे
वह बांसुरी जाने कहां खो गयी
और रांझे के सब भाई
बांसुरी बजाना भूल गये
धरती पर लहू बरसा
कबरें टपकने लगीं
और प्रीत की शहजादियां
मजारों में रोने लगीं
आज सब कैदों* बन गये
हुस्न इश्क के चोर
मैं कहां से ढूंढ के लाऊं
एक वारिस शाह और.

जिस किसी ने अमृता की इस नज़्म को पढ़ा, तकसीम के मनाज़िर उसके रु-बरू आतिश-अंगेज़ हो गए | तकसीम से सीधे और किनायतन (indirectly) जो मख्लूक़ (people) ताअस्सुर (affect) हुए, उनकी ज़बान पे ये नज़्म आती-जाती सांस की मानिंद थी | अहमद नदीम कासमी ने भी ये नज़्म तब पढ़ी जब वो जेल में थे और इस नज़्म का ज़िक्र उन्होंने फैज़ अहमद फैज़ की एक किताब के मुक़द्दमे (introduction) में किया | जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने पाया के कई लोग जेब से कागज़ पे लिखी नज़्म को बार-२ बाहर निकालकर, आँखों से लगाकर, फूट-२ कर रोते हुए ये नज़्म पढ़ते थे | इस नज़्म का असर इतना था के अमृता जहाँ-२ भी जाती, लोग उसके हाथ चूम लेते और हलक तक फराहम आज़ाब को आँखों से बयाँ कर देते |

जहाँ कुछ लोग तकसीम के दर्दनाक मनाज़िर और जहालत भरे ज़ाती तजुर्बों को अमृता की नज़्म में देखते थे, वहीं कुछ इन्तहा-पसंद सिखों का ये कहना था के ये नज़्म सिखों के गुरु 'नानक' को ख़िताब (address) करते हुए कहनी चाहिए थी, न की 'वारिस शाह' को | कुछ कोम्युनिस्ट तो 'लेनिन' और 'स्टालिन' का नाम तक लेने से नहीं चुके | बहरहाल, ये नज़्म एक शायरा के ज़ाती तजुर्बात और अहसासात का आइना थीं, कोई सियासी तहरीर नहीं |

उधर साहिर दिल्ली तो पहुँच गए, लेकिन लुधियाना अभी दूर था | फसादात के बाईस हालात इतने संगीन थे के साहिर का लुधियाना जाना ख़तरात को दावत देना ही नहीं, बल्कि न-मुमकिन था | साहिर के दोस्तों, जिनमें कोमरेड मदन लाल द्विवेदी, पेंटर बावरी, कोमरेड ओमप्रकाश, जोगिन्दर पाल पांडे थे, ने साहिर की माँ के बारे में मालूमात हासिल की और किसी तरह उन तक पहुँच भी गए | ये सभी लोग साहिर की माँ को अपनी माँ की तरह समझते थे और साहिर की माँ भी इन्हें बहुत प्यार करती थी | इन लोगों ने साहिर की माँ को मुहाजिरों की छावनी (refugee camp) तक पहुंचा दिया | जोगिन्दर पाल और ओम प्रकाश जो अपने मुसलमान दोस्तों को बचाने की कोशिश कर रहे थे, फ़सादियों ने हालाक कर दिया | मौके की नज़ाकत और बिगड़ते हुए हालात देखकर, पेंटर बावरी ने साहिर की माँ को पाकिस्तान जाने वाले काफिले के साथ रवाना कर दिया | बावरी जब माँ को रवाना कर के वापिस लौट रहा था तो दंगाईयों ने मुसलमानों की मद्दद करने के इलज़ाम में उस पर धावा बोल दिया और उस की जम कर पिटाई की | जोगिन्दर पाल पांडे जो सेहत के लिहाज़ से दारा सिंह से कम नहीं थे, इत्तेफ़ाक़न मौके पर पहुंचे और दंगाइयों का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया और पेंटर बावरी को बेहोशी की हालत में घर ले आये | होश आने पर बावरी को इस मार का कोई गम नहीं था और इस बात की ख़ुशी थी के वो साहिर की माँ को सलामती से पकिस्तान के लिए रवाना कर पाया |

इंसानियत को जिंदा रखने की खूब कीमत चुकाई साहिर के इन दोस्तों ने | बहर कैफ़ हो साहिर के दोस्तों को ये तसल्ली हुई के साहिर की माँ ब-हिफाज़त पाकिस्तान पहुँच गयीं |

अभी साहिर दिल्ली में थे के उन को ये खबर मिली के उनकी अम्मी उनके दोस्तों की मद्दद से सही सलामत लाहौर पहुँच गयी है | ये सुनकर साहिर को तसल्ली हुई | दोस्तों की कुर्बानियों ने साहिर को जज़्बाती कर दिया | दो फिरकों के बीच खिची इस ख़ूनी लकीर को आपसदारी भी धो न पाई | साहिर अम्मी की तलाश में लाहौर के लिए रवाना हो गए | बहुत दिनों तक साहिर माँ को यहाँ-वहां तलाशते रहे और आखिरकार उसकी मुलाक़ात माँ से हो गई |

अब साहिर के सामने ये मसला था के रोज़ी-रोटी के लिए क्या किया जाये | नया माहौल, नए लोग सभी कुछ बहुत मुश्किल लग रहा था | बहरहाल, साहिर ने अपनी कोशिश जारी रखी और एक दिन मानो साहिर का सितारा चमक उठा | चौधरी नज़ीर अहमद जो की लाहौर में एक नश्रीयात इदारे (publishing house) के मालिक थे, साहिर के मुरीद थे | वो साहिर को तब से जानते थे जब साहिर 'अदब-ऐ-लतीफ़' के लिए काम करते थे | 'अदब-ऐ-लतीफ़' चौधरी बरकत अली साहब ने 1935 में शुरू किया था, जो की चौधरी नजीर के रिश्तेदार थे | इसी परिवार नें उर्दू अदब को 'नया इदारा', 'मक्तबा जदीद' और 'मक्तबा उर्दू' जैसे रिसाले बक्शे | जब उन्हें मालूम हुआ के साहिर काम-काज की तलाश में हैं, उन्होंने मौका गवाए बगैर उर्दू अदब से निस्बत रखने वाले दो-माही रिसाले 'सवेरा' के लिए साहिर और अहमद नदीम कासमी को बतौर मुदीर शामिल किया | 'सवेरा' उस दौर का अपनी तरह का इकलौता शानदार रिसाला था, जो करीबन 1945 में चौधरी नजीर अहमद साहब ने अपनी सरपरस्ती में शुरू किया था | इस तरह के रिसालों का उन दिनों कोई चलन नहीं था | मज़मून और मेयारी तौर पर 'सवेरा' का कोई सानी नहीं था, लेकिन 'सवेरा' तरक्की-पसंद अदीबों के फलसफे का आइना होने की वजह से उस वक़्त की पाकिस्तानी हुकूमत की आँखों में खूब खटकता था | 'सवेरा' की कार-गुजारी पर हुकूमत की ख़ासी नज़र रहती थी |
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तकसीम के बाद लाहौर और कराची में जैसे सितारों की भीड़ जमा हो गयी थी | उर्दू अदब से राबिता रखने वाले ज़्यादातर अदीब पाकिस्तान कूच कर गए थे | लाहौर तो हमेशा से ही शायरों, अदीबों और दूसरे फनकारों का अड्डा था, लेकिन कराची भी इन दिनों अदबी सरगर्मियों मैं रहता था | जो लोग हिंदुस्तान में ऊंचे खानदानों और माली तौर पर बहुत अच्छी हालत में थे, वही लोग पाकिस्तान आ कर रोज़ी रोटी की तलाश में फिरते नज़र आ रहे थे | बहुत से शौराओं के घर तो फाके की सी हालत थी | छोटी-मोती मुलाज़मत करके कुछ लोग घर वालों का पेट भर पा रहे थे |

ये साहिर के 'सवेरा' में काम करने से पहले और पाकिस्तान मुन्तकिल होने के बाद की बात है | साहिर ने कुछ दिनों शाहिद अहमद देहलवी के रिसाले 'साकी' में भी काम किया | दरअसल 'साकी' की इब्तेदा तकसीम से पहले दिल्ली में की जा चुकी थी | ये रिसाला अदबी हलके में मकबूल तो था लेकिन माली तौर पर हमेशा दिक्कतों के दरम्यान ही रहा | इसी से राबिता रखता हुआ 'साक़ी बुक डिपो' आहिस्ता-२ माली तौर पर साबित होता जा रहा था | लेकिन १९४७ में तकसीम के वक़्त न तो रिसाला बचा, न डिपो और न ही बैंक में जमा हुआ पैसा | लाहौर पहुँचने पर शाहिद ने 'साक़ी' को फिर शुरू करने के लिए अर्ज़ी दी जो जल्द ही न-मंज़ूर हो गयी | हताश शाहिद, लाहौर से कराची चले गए और नौकरी की ज़रुरत ने उन्हें रईसी के दिनों में सीखे मौसिक़ी के हुनर को पेशे के तौर पर लेने के लिए अमादा कर दिया | कुछ वक़्त तक वो रेडियो स्टेशन कराची में बतौर फनकार काम करते रहे | बहुत कम लोगों को ये पता था के एस.ए. देहलवी कोई और नहीं बल्कि शम्स-उल-उलेमा मौलवी नज़ीर अहमद देहलवी के पड़पोते हैं, जो की डेपुटी नज़ीर अहमद के नाम से मशहूर थे और मकबूल नाविल-निग़ार थे | मुख्फ्फफ़ (abbreviated) नाम रखने की वजह खानदान को शर्मिंदगी से बचाना था |


1948 में शाहिद 'साक़ी' को फिर से शुरू करने में कामयाब हो गए | एक बार फिर ये रिसाला खूब पसंद किया जाने लगा, लेकिन माली तौर पर हमेशा की तरह नुक्सान में ही रहा |

जब साहिर लाहौर में रहते थे. वहां के अदबी माहौल में उनका खासा नाम था, लेकिन अदब-ऐ-लतीफ़ में काम मिलने से पहले उनकी माली हालत अच्छी नहीं थी, अगर ये कहा जाये के बहुत बुरी थी तो सही होगा | इन्ही दिनों काम की तलाश में साहिर कराची पहुँच गए जहाँ 'साक़ी' के लिए शाहिद को एक मुदीर की तलाश थी | साहिर जानते थे के वसीले (resources) कम और मेहदूद (limited) होने की वजह से रिसाला घाटे में चल रहा था | ऐसी सूरत में काम करना और साथी-मुलाज़िमों को काम करने के लिए राग़िब (motivated) रखना उनके लिए बहुत मुश्किल था | फिर भी साहिर की हमेशा ये कोशिश रहती थी कि कम ही क्यों न हो लेकिन मुसन्निफ़ को वक़्त पर उसका मेहनताना ज़रूर मिलना चाहिए |
एक बार वे किसी भी मुसन्निफ़ को वक़्त पर पैसे नहीं भेज सके और ग़ज़लकार शमा ‘लाहौरी’ साहब को पैसे की सख्त ज़रूरत थी | वे कड़ाके की ठंड में कांपते हुए साहिर के घर पहुंचे और हिचकिचाते हुए दो ग़ज़लों के पैसे मांगे |

साहिर उन्हें बड़ी इज्ज़त से अंदर ले गए. उन्होंने ग़ज़लकार शमा ‘लाहौरी’ को अपने हाथों से बनाकर गर्म चाय पिलाई | जब शमा ‘लाहौरी’ को ठंड से थोड़ी राहत मिली तो साहिर अपनी कुर्सी से उठे और उन्होंने खूंटी पर टंगा हुआ अपना महंगा कोट उतारा, जिसे उनके किसी मुरीद ने कुछ दिनों पहले ही तोहफ़े में दिया था | कोट को जवान शायर के हाथों में थमाते हुए कहने लगे – “मेरे भाई, बुरा न मानना लेकिन इस बार नक़द के बदले जिंस (material, article) में मेहनताना दिया जा रहा है |”

शमा ‘लाहौरी’ साहब की आंखें नम हो गईं और वो कुछ भी न बोल सके |

1 comment:

  1. बेहद दिलचस्प पोस्ट है...अमृता और साहिर के बारे में पढना हमेशा ही अच्छा लगता है...

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